मौलिक अधिकारों के नाम पर अराजकता फैलाने का प्रयास किया जा रहा है
दिव्य चिंतन
हरीश मिश्र
हिजाब का मुद्दा राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है। जो छात्राएं हिजाब के समर्थन में और छात्र विरोध में सड़कों पर उतरे हैं , मजहब के ठेकेदार उनका दुरुपयोग कर रहे हैं। हिजाब तो बहाना है। मकसद सामाजिक एकता को विषक्त करना है।
संविधान में मौलिक अधिकारों के समावेश का उद्देश्य उन मूल्यों के संरक्षण से है जो एक स्वतंत्र समाज के लिए जरूरी है। संविधान से स्वतंत्रता की गारंटी मिली है, स्वच्छंदता की नहीं।
मौलिक अधिकारों के नाम पर समाज में अराजकता और अव्यवस्था फैलाने का प्रयास किया जा रहा है। यह एक सोची-समझी अंतर्राष्ट्रीय साजिश है।
संविधान में जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं वे आत्यंतिक अधिकार नहीं है। किसी भी समाज में व्यक्तियों को पूर्ण और असीमित अधिकार नहीं दिए जा सकते अन्यथा उनके दुरुपयोग की पूरी संभावना रहती है। धर्म, मज़हब को ऐसी स्वतंत्रता प्रदान नहीं की जा सकती कि वह समाज में अराजकता और अव्यवस्था पैदा करे।
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून की समान संरक्षण की गारंटी प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने चरनजीत लाल चौधरी विरुद्ध भारत संघ मामले में व्याख्या की थी कि समान संरक्षण का अर्थ समान परिस्थितियों में एक समान संरक्षण है। इस प्रकार किसी भी धर्म, पंथ के अनुयायियों को मनमाने पन की गारंटी नहीं दी जा सकती। यदि हिजाब को अनुमति दी गई तो कल बहुसंख्यक धोती-कुर्ता पहनावे के लिए शैक्षणिक संस्थाओं को बाध्य करेंगे।
संविधान के अनुच्छेद 25 (1) के अनुसार सरकारी एवं मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा की मनाही है।
शैक्षणिक संस्थाओं में ड्रेस कोड भी संवैधानिक अधिकार है। समय आ गया है कि स्वतंत्रता के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और शैक्षणिक संस्थानों की सीमा भी तय की जाए । यदि सीमा रेखा तय नहीं की गई तो राष्ट्रीय एकता को गम्भीर आघात पहुंचेगा।
संविधान, संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार प्रदान करता है। व्यक्ति को विचार, अभिव्यक्ति, पूजा, विश्वास व भक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। अनुच्छेद 29 व 30 में अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण तथा उन्हें शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने का मूल अधिकार प्रदान किया गया है। इसका अर्थ यह है कि संरक्षण प्राप्त संस्थाओं में अल्पसंख्यक धार्मिक शिक्षा और पहनावे का प्रयोग कर सकते हैं।
धर्म, पंथ, मज़हब आधारित शिक्षा के लिए गुरुकुल, मदरसा हैं जो सरकार से प्राप्त मान्यता और अनुदान से संचालित होते हैं। इन मज़हबी शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक पहनावे की स्वतंत्रता दी गई है। लेकिन सरकारी एवं गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक, मज़हबी पहनावे, धार्मिक शिक्षा की छूट नहीं दी जा सकती, न दी जानी चाहिए। ये ठेकेदार ऐसे घातक विष के बीज बो रहे हैं जिसकी फसल बड़ी कड़वी होगी। यदि हर धर्म के अनुयायी अपने धार्मिक रीति-रिवाज का अनुसरण शैक्षणिक संस्थानों में करेंगे तो गलत होगा।
किसी भी धर्म, पंथ के अनुयाइयों को लगता है कि उनके धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है तो वे सर्वोच्च न्यायालय से न्याय प्राप्त कर सकते हैं। मौलिक अधिकार आत्यंतिक अधिकार नहीं है। इन अधिकारों पर आवश्यकता पड़ने पर जनहित में सरकार प्रतिबंध भी लगा सकती है।
संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा नागरिकों के कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। संवैधानिक अधिकार मांगने वालों को अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए।
संविधान निर्माताओं ने हमें धर्मनिरपेक्ष संविधान प्रदान किया है। जिसका उद्देश्य देश की एकता और अखंडता को बनाए रखना है।



