
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
सोमवार 15 दिसम्बर 2025
15 दिसम्बर 2025 दिन सोमवार को पौष मास के कृष्ण पक्ष कि एकादशी तिथि है। आज की एकादशी को सफला एकादशी व्रत के नाम से जाना जाता है। आज की यह सफला एकादशी व्रत स्मार्त और वैष्णव सभी भक्तों के लिए है। शास्त्रानुसार एकादशी का व्रत सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक पुण्यदायी व्रत होता है। इसे हर एक सनातनी व्यक्ति को जीवन में अवश्य करना चाहिए। आप सभी सनातनियों को “सफला एकादशी व्रत” की हार्दिक शुभकामनायें।।
महा मृत्युंजय मंत्र – ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।
☄️ *दिन (वार) – सोमवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से पुत्र का अनिष्ट होता है शिवभक्ति को भी हानि पहुँचती है अत: सोमवार को ना तो बाल और ना ही दाढ़ी कटवाएं । *सोमवार के दिन भगवान शंकर की आराधना, अभिषेक करने से चन्द्रमा मजबूत होता है, काल सर्प दोष दूर होता है।
*सोमवार का व्रत रखने से मनचाहा जीवन साथी मिलता है, वैवाहिक जीवन में लम्बा और सुखमय होता है। *जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए हर सोमवार को शिवलिंग पर पंचामृत या मीठा कच्चा दूध एवं काले तिल चढ़ाएं, इससे भगवान महादेव की कृपा बनी रहती है परिवार से रोग दूर रहते है।
*सोमवार के दिन शिव पुराण के अचूक मन्त्र “श्री शिवाये नमस्तुभ्यम’ का अधिक से अधिक जाप करने से समस्त कष्ट दूर होते है. निश्चित ही मनवाँछित लाभ मिलता है। 🔮 *शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल* 🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
👸🏻 शिवराज शक 352 प्रारम्भ
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126_
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
🌧️ ऋतु – सौर हेमंत ऋतु
⛈️ मास – पौष मास
🌒 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📅 तिथि – सोमवार पौष माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि 09:20 PM तक उपरांत द्वादशी
📝 तिथि स्वामी – एकादशी के देवता हैं विश्वेदेवगणों और विष्णु। इस तिथि को विश्वेदेवों पूजा करने से संतान, धन-धान्य और भूमि आदि की प्राप्ति होती है।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र चित्रा 11:08 AM तक उपरांत स्वाति
🪐 नक्षत्र स्वामी – चित्रा नक्षत्र के स्वामी मंगल ग्रह हैं और इसके अधिष्ठाता देव (संरक्षक देवता) विश्वकर्मा (या त्वष्टा) हैं, जो शिल्प और वास्तुकला के देवता हैं.
⚜️ योग – शोभन योग 12:30 PM तक, उसके बाद अतिगण्ड योग
⚡ प्रथम करण : बव – 08:03 ए एम तक
✨ द्वितीय करण : बालव – 09:19 पी एम तक कौलव
🔥 सोमवार का शुभ गुलिक कालः-शुभ गुलिक काल 01:42:00 P.M से 02:59:00 P.M बजे तक
⚜️ दिशाशूलः- आज के दिन पूर्व दिशा की यात्रा नहीं करना चाहिए यदि यात्रा करना ज्यादा आवश्यक हो तो घर से दर्पण देखकर या दूध पीकर जायें।
🤖 राहुकालः- आज का राहु काल 08:26:00 A.M से 09:39:00 A.M बजे तक
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 06:43:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 05:09:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:17 ए एम से 06:12 ए एम
🌆 प्रातः सन्ध्या : 05:44 ए एम से 07:06 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : 11:56 ए एम से 12:37 पी एम
🔯 विजय मुहूर्त : 02:00 पी एम से 02:41 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 05:24 पी एम से 05:51 पी एम
🌌 सायाह्न सन्ध्या : 05:26 पी एम से 06:48 पी एम
💧 अमृत काल : 04:15 ए एम, दिसम्बर 16 से 06:03 ए एम, दिसम्बर 16
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:49 पी एम से 12:44 ए एम, दिसम्बर 16
🚓 यात्रा शकुन-मीठा दूध पीकर यात्रा करें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ सौं सौमाय नम:।
💁🏻 आज का उपाय-शिवजी का दुग्धाभिषेक करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-पलाश के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ *पर्व एवं त्यौहार – सफला एकादशी व्रत (सर्वे स्मार्त)/ हानुक्का (ज्यु – यहुदी)/ आचार्य श्री गोपी राम जन्म दिवस/(भारत रत्न से सम्मानित उप प्रधानमंत्री) ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभ भाई पटेल स्मृति दिवस, शाहू महाराज जन्म दिवस, ब्रह्माकुमारीज़ के संस्थापक लेखराज जन्म दिवस, भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता सतीश चंद्र सामंत जन्म दिवस, राष्ट्रीय कपकेक दिवस, अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस, बिल्ली चरवाहा दिवस, प्रधानमंत्री द्वारा दूरदर्शन की फ्री-टू-एयर डीटीएच सेवा ‘डीडी डायरेक्ट+’ स्थापना दिवस, भारतीय पार्श्व गायिका उषा मंगेशकर जयन्ती, भारतीय महिला पहलवान गीता फोगट जन्म दिवस, स्वामी रंगनाथानंद जयन्ती, सत्तीराजू लक्ष्मीनारायण जन्म दिवस, मानवाधिकार दिवस, योजना आयोग स्थापना दिवस, हवाई सुरक्षा दिवस (सप्ताह) ✍🏼 *तिथि विशेष – एकादशी तिथि को चावल एवं दाल नहीं खाना चाहिये तथा द्वादशी को मसूर नहीं खाना चाहिये। यह इस तिथि में त्याज्य बताया गया है। एकादशी को चावल न खाने अथवा रोटी खाने से व्रत का आधा फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। एकादशी तिथि एक आनन्द प्रदायिनी और शुभफलदायिनी तिथि मानी जाती है। एकादशी को सूर्योदय से पहले स्नान के जल में आँवला या आँवले का रस डालकर स्नान करना चाहिये। इससे पुण्यों कि वृद्धि, पापों का क्षय एवं भगवान नारायण के कृपा कि प्राप्ति होती है।।
🗺️ Vastu tips 🗽
मोती पहनने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह गुस्से और तनाव को कम करता है। इसका प्रभाव मन पर बहुत कोमलता से पड़ता है और धीरे-धीरे व्यक्ति ज्यादा शांत होने लगता है। इसके साथ ही मन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। नकारात्मक विचार कम होते हैं। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है। नींद की गुणवत्ता सुधरती है। घर-परिवार और कार्यस्थल पर माहौल संतुलित रहता है। जो लोग भावनात्मक रूप से जल्दी टूट जाते हैं या छोटी-छोटी बातों पर भड़क जाते हैं, उनके लिए मोती एक बहुत असरदार उपाय माना जाता है।
*मोती धारण करने का सही समय ज्योतिष में सोमवार का दिन चंद्र ग्रह और मोती के लिए सबसे शुभ माना गया है। पहनने से पहले रत्न की शुद्धि जरूर करें। इसके लिए.. गंगाजल, दूध, शहद का इस्तेमाल किया जाता है। मोती को थोड़ा समय इन तरल पदार्थों में रखकर शुद्ध माना जाता है। इसके बाद इसे पूजा-अर्चना के साथ धारण करना चाहिए। 🎯 *जीवनोपयोगी कुंजियां* ⚜️ अनियंत्रित दिल की धड़कन: कमज़ोर दिल की वजह से दिल की धड़कन अपना नियंत्रण खो देती है। इस स्थित में हार्ट बहुत तेज़, बहुत धीरे या अनियमित रूप से धड़कता है। यह अक्सर हार्ट फेलियर या हार्ट अटैक से हुए नुकसान जैसी समस्याओं के कारण होता है। इससे चक्कर आना, घबराहट, सांस लेने में तकलीफ और कमजोरी जैसे लक्षण होते हैं। *लगातार थकान: कमज़ोर दिल की वजह से हर समय थकान जैसा महसूस हो सकता है। दरअसल, जब दिल खून को अच्छी तरह से पंप नहीं कर पाता। है तब उस वजह से हर समय थकान होता है। इस स्थिति में आसान काम करने में भी व्यक्ति थक जाता है।
*सांस लेने में तकलीफ: अगर आपको सांस लेने में बार बार तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है। ज़रा सा चलते हुए भी अगर आप ज़ोर-ज़ोर से सांस ले रहे हैं तो आपको एक बार डॉक्टर को ज़रूर दिखाना चाहिए। 💉 आरोग्य संजीवनी 🩸
क्या हरड चूर्ण रोज लेना चाहिए?
*_50 वर्ष से अधिक उम्र वाले किसी भी तरह के चूर्ण का सेवन न करें। क्यों उनका पाचन तंत्र मजबूत न होने से पेट में बीमारियां बढ़ने लगती हैं। हतद मुरब्बा लेना लाभदायक सिद्ध होगा।
*प्राचीनकाल में आयुर्वेद की सभी दवाएं, चूर्ण, चटनी, पाक, अवलेह, च्यवनप्राश तथा आचार आदि सभी को कांच के मर्तबान में ऊपर से लकड़ी का कॉक लगाकर ढक्कन लगाकर बन्द करके रखते थे।
*प्लास्टिक में खाने पीने के पदार्थ, आयुर्वेदक औषधियां च्यवनप्राश रखने से खून की खराबी, रक्त दोष, त्वचा रोग, स्किन प्रॉब्लम आदि बीमारियां होने लगती हैं। खासकर चेहरे पर झाइयां, झुर्रियां आ जाती हैं। *महिलाओं तथा बच्चों को विशेषकर प्लास्टिक जार में रखें माल्ट, चूर्ण, च्यवनप्राश वाले उत्पादों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। क्योंकि इनकी स्किन बहुत संवेदनशील होने से त्वचा खराब हो सकती है। *प्लास्टिक पेकिंग में रखी दवाइयां विष स्वरूप हो जाती हैं। *केवल कांच की बोतल वाले चूर्ण, अवलेह, च्यवनप्राश, माल्ट ओर उबटन का उपयोग हितकारी है।
📖 गुरु भक्ति योग 🕯️
शिव सती का विवाह
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दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्तिसंपन्न हो एवं सर्व विजयिनी हो। जिसके कारण दक्ष एक ऐसी हि पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करतेकरते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण वश तप कर रहे हों? दक्ष नें तप करने का कारण बताय तो मां बोली मैं स्वय पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी। मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सतीने बाल्य अवस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चलित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मयता होती रहती थी। जब सती विवाह योग्य होगई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं।
*अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु एक ऐसी घटना घटीत होगई जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया। *एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र होगये थे। भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
*एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने बहोत बडे यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं। *इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?
*भगवान शंकर ने उत्तर दिया, आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे? *सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।
*भगवान शिव ने उत्तर दिया, इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं। इस पर सती ने प्रश्न किया एसा क्युं? भगवान शिव ने उत्तर दिया विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नही जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति कि हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं। लेकिन सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बार दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं। *घर में सतीसे किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहां मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांतिभांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं।
*तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं। *पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषिमुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धूधू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं पितृश्रेष्ठ यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा।
*दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा। *सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा ओह मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं, तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं।
*वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमान जनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती। सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। *वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्ल-उछल कर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषिमुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा।
*वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त कि थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए । *भगवान शिव ने उन्मत कि भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम पाहिमाम भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े।
*वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काटकाट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कटकटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे। *धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कटकटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं।”
ऊँ नमः शिवाय *🚩🪷🚩🙏🚩🪷
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⚜️ एकादशी तिथि के देवता विश्वदेव होते हैं। नन्दा नाम से विख्यात यह तिथि शुक्ल पक्ष में शुभ तथा कृष्ण पक्ष में अशुभ फलदायिनी मानी जाती है। एकादशी तिथि एक आनंद प्रदायिनी और शुभ फलदायी तिथि मानी जाती है। इसलिये आज दक्षिणावर्ती शंख के जल से भगवान नारायण का पुरुषसूक्त से अभिषेक करने से माँ लक्ष्मी प्रशन्न होती है एवं नारायण कि भी पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
*_यदि एकादशी तिथि रविवार और मंगलवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। इसके अलावा एकादशी तिथि शुक्रवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है। ऐसे समय में किसी भी कार्य की सिद्धि प्राप्ति का योग निर्मित होता है। यदि किसी भी पक्ष में एकादशी सोमवार के दिन पड़ती है तो क्रकच योग बनाती है, जो अशुभ होता है। इसमें शुभ कार्य निषिद्ध बताये गये हैं। एकादशी तिथि नंदा तिथियों की श्रेणी में आती है। वहीं किसी भी पक्ष की एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ माना जाता है।



