धार्मिक

वट अमावस्या और वट सावित्री व्रत नारी शक्ति, त्याग-तपस्या का जीवंत प्रतीक

प्रकृति रक्षा का पौराणिक संदेश है वटवृक्ष पूजा
संस्कृति, आस्था, सृष्टि, अक्षय ऊर्जा तथा मोक्ष का प्रतीक है वटवृक्ष
सावित्री-सत्यवान की कथा है विख्यात, यमराज से पति कोई वापस लिया

रिपोर्टर : कमल याज्ञवल्क्य
बरेली । सोमवार दोपहर से रायसेन जिले सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में वट अमावस्या और वट सावित्री व्रत पर शहरों और गांवों में वटवृक्ष पूजा कर वट सावित्री व्रत का महापर्व मनाया जा रहा है। इस अंचल की परंपरा के अनुसार सुबह से व्रत के लिए तैयारियां शुरू हो गई थीं। सुहागन महिलाओं ने घरों में ही शुद्धता के साथ बेसन आटे तथा गुड़ के मीठे और नमकीन बरबूटा बनाए। वटवृक्ष की पारंपरिक रूप से पूजा की तथा कच्चा सूता (धागा) वटवृक्ष में बांधकर परिक्रमा की तथा बरबूटा वृक्ष के ऊपर उछालकर उत्सव मनाया। बच्चों में बरबूटा लूटने की होड़ लगी रही।
भारतीय संस्कृति में है विशेष महत्व
भारतीय संस्कृति में व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व है, जो न केवल धार्मिक आस्था से जुड़े होते हैं, बल्कि समाज के सांस्कृतिक, पारिवारिक और नैतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करते हैं। ऐसा ही महत्वपूर्ण व्रत हैं—वट अमावस्या और वट सावित्री व्रत, जो विशेष रूप से सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु, आरोग्य और सौभाग्य के लिए श्रद्धापूर्वक किया जाता हैं। इस व्रत का पौराणिक महत्व समृद्ध है, और यह व्रत वट वृक्ष (बड़) की पूजा से जुड़ा होता है।
वट सावित्री व्रत कथा और पौराणिक महत्व
इस अंचल में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या तिथि को किया जाता है। जिसे वट अमावस्या भी कहा जाता है। इस व्रत की कथा पौराणिक महत्व का मूल सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ा हुआ है, जो महाभारत के ‘वन पर्व’ में वर्णित है। सावित्री, राजा अश्वपति की पुत्री थीं, जिन्होंने तप, ब्रह्मचर्य और व्रतशीलता से युक्त होकर अत्यंत तेजस्विनी जीवन व्यतीत किया। उन्होंने अपने लिए सत्यवान नामक वनवासी, किन्तु धर्मनिष्ठ राजकुमार को पति रूप में चुना, जिसकी आयु अल्पकाल थी।विवाह के बाद सावित्री को ज्ञात हुआ कि सत्यवान का जीवन एक वर्ष शेष है। नियत दिन वह अपने पति के साथ वन में गईं, जहाँ सत्यवान को अचानक मूर्छा आई और मृत्यु ने उसे आ घेरा।यमराज स्वयं सत्यवान के प्राण हरने आए, लेकिन सावित्री अपने पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज का पीछा करती रहीं और उन्हें धर्म, भक्ति और तर्क से प्रसन्न कर दिया। अंततः यमराज ने उन्हें पुत्र, सास-ससुर की दृष्टि, पिता का राज्य और अंत में सत्यवान का जीवन लौटाने का वरदान दिया। यह कथा पतिव्रता धर्म की पराकाष्ठा मानी जाती है और इसी उपलक्ष्य में यह व्रत किया जाता है।
वट वृक्ष : भारतीय संस्कृति में त्रिदेवों का प्रतीक माना गया है
वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थायित्व और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। व्रती स्त्रियाँ वट वृक्ष की पूजा करती हैं, सूती धागा (कच्चा सूत) पेड़ के चारों ओर लपेटती हैं, और 7, 11 या 108 बार परिक्रमा कर पति की दीर्घायु और सौभाग्य की मंगलकामना करती हैं। व्रती स्त्रियाँ वट वृक्ष के नीचे जाकर हल्दी, कुमकुम, पुष्प, अक्षत, जल, फल-मिठाई आदि अर्पित
वट वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाया जाता है।फिर वृक्ष की परिक्रमा करते हुए कच्चे सूत से उसे लपेटा जाता है। यहीं वृक्ष की छाया में सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी और पढ़ी जाती है। धार्मिक ग्रन्थों में वटवृक्ष को ब्रम्हा, बिष्णु और महेश त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है।
अक्षयत्व का भीप्रतीक:वटवृक्ष
पुराणों के अनुसार वटवृक्ष की आयु अत्यंत दीर्घ होती है। यह शाश्वतता, अक्षय सौभाग्य और दीर्घायु का प्रतीक है। महाभारत में कहा गया है कि वट वृक्ष युगों-युगों तक जीवित रहता है, अतः स्त्रियाँ अपने पतियों के दीर्घ जीवन की कामना से इसकी पूजा करती हैं।

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