घोष की धुन पर कदमताल करते स्वयंसेवक, पुष्पवर्षा से हुआ भव्य स्वागत

संघ के शताब्दी वर्ष के समापन पर सिलवानी में निकला पथ संचलन, बजरंग चौराहे पर हुआ द्विधारा संगम
सिलवानी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के समापन कार्यक्रम के उपलक्ष्य में रविवार को सिलवानी नगर में भव्य पथ संचलन एवं द्विधारा संगम का आयोजन किया गया। पूर्ण गणवेश में घोष की धुन पर कदमताल करते स्वयंसेवकों ने अनुशासन, एकरूपता और संगठनात्मक एकता का परिचय दिया। नगर के विभिन्न मार्गों से निकले पथ संचलन का जगह-जगह पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता और सेवा भाव के संकल्प को दोहराया गया।
कार्यक्रम में सेवानिवृत्त न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्यभारत प्रांत संघचालक अशोक पांडेय का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उन्होंने शाखा की नियमितता, व्यक्ति निर्माण, सामाजिक परिवर्तन और शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित कार्यक्रमों को निरंतर आगे बढ़ाने पर जोर दिया। इस अवसर पर जिला कार्यवाह राजेंद्र राजपूत एवं सिलवानी खंड संघचालक आनंद ठाकुर मंचासीन रहे।
बजरंग चौराहे पर हुआ द्विधारा संगम
पथ संचलन में शिवाजी बस्ती, विजयासन बस्ती एवं महावीर बस्ती के स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। नगर में निकले दोनों संचलनों का बजरंग चौराहे पर द्विधारा संगम हुआ। इसके बाद स्वयंसेवकों ने भोपाल रोड, तहसील, होली चौक, आजाद मार्केट एवं गांधी चौक से होते हुए हाईस्कूल मैदान तक संचलन किया, जहां कार्यक्रम का समापन हुआ।
पथ संचलन के दौरान स्वयंसेवकों की अनुशासित कदमताल और घोष की धुन आकर्षण का केंद्र रही। नगरवासियों ने विभिन्न स्थानों पर पुष्पवर्षा कर स्वयंसेवकों का स्वागत किया।
नियमित शाखा है व्यक्ति निर्माण का केंद्र
अपने उद्बोधन में प्रांत संघचालक अशोक पांडेय ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण है और शाखा इस कार्य का प्रमुख केंद्र है। नियमित शाखा, खेल, अनुशासन, संस्कार, सेवा और निरंतर अभ्यास से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास होता है। शाखा के माध्यम से स्वयंसेवकों में राष्ट्र और समाज के प्रति कर्तव्यबोध विकसित होता है।
उन्होंने कहा कि पथ संचलन का उद्देश्य समाज में भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि अनुशासन, विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देना है। संगठन की वास्तविक शक्ति स्वयंसेवकों के आचरण और समाज के बीच किए जाने वाले सेवा कार्यों में दिखाई देती है।
पांडेय ने मुख्य शिक्षक, कार्यवाह एवं अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से शाखाओं में नियमित अभ्यास सुनिश्चित करने और प्रत्येक स्वयंसेवक से व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के अनुभवों से सीखते हुए अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना चाहिए।
शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का निरंतर अनुवर्तन जरूरी
प्रांत संघचालक ने कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान प्रबुद्धजन गोष्ठियों, सामाजिक सद्भाव बैठकों, गृह संपर्क अभियानों, हिंदू सम्मेलनों एवं युवा कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने का प्रयास किया गया है। इन आयोजनों की सार्थकता तभी है, जब उनसे जुड़े लोगों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखा जाए और उन्हें सामाजिक कार्यों से जोड़ा जाए।
उन्होंने कहा कि किसी भी कार्यक्रम के आयोजन के बाद उसका अनुवर्तन करना और कार्यों की नियमित समीक्षा करना आवश्यक है। स्वयंसेवकों को समाज परिवर्तन के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए संगठनात्मक गतिविधियों को निरंतर आगे बढ़ाना चाहिए।
राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति संघ का लक्ष्य
अशोक पांडेय ने कहा कि संघ की प्रार्थना में राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का संकल्प व्यक्त होता है। इसका व्यापक उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग और अंतिम व्यक्ति के विकास के साथ राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति सुनिश्चित करना है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन में भी समग्र समाज के विकास की अवधारणा निहित है।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन एवं विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र के पुनरुत्थान और संगठित समाज के निर्माण का उनका संकल्प आज भी संघ कार्य की प्रेरणा है। उन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव, स्वार्थ और कुरीतियों को दूर कर संगठित, संस्कारित, समरस एवं सशक्त समाज के निर्माण पर बल दिया।
दायित्व नहीं, सेवा और समर्पण का भाव महत्वपूर्ण
पांडेय ने कहा कि संघ में मुख्य शिक्षक, कार्यवाह, गण शिक्षक एवं अन्य दायित्व संगठनात्मक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के माध्यम हैं। इन्हें पद-प्रतिष्ठा का साधन मानने के बजाय सेवा और समर्पण के भाव से निभाया जाना चाहिए।
उन्होंने परम पूजनीय श्री गुरुजी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन में व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण स्वयंसेवक भाव है। वरिष्ठ स्वयंसेवकों का अनुशासन, सादगी और समर्पण नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।
उन्होंने कहा कि गणवेश अनुशासन और संगठनात्मक एकरूपता का प्रतीक है। गणवेश को स्वच्छ एवं व्यवस्थित रखना और निर्धारित समय पर उपस्थित होना स्वयंसेवक के अनुशासन को दर्शाता है। स्वयंसेवकों को दिखावे और अनावश्यक प्रचार के बजाय अपने आचरण, सेवा एवं संस्कारों से समाज में विश्वास बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
आलोचनाओं के बजाय रचनात्मक कार्यों पर दें ध्यान
अशोक पांडेय ने कहा कि विभिन्न टिप्पणियों और चुनौतियों के बीच अनावश्यक बहस में उलझने के बजाय रचनात्मक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सेवा, संवेदना, संस्कार और सकारात्मक आचरण समाज में विश्वास बढ़ाने के प्रभावी माध्यम हैं। शक्ति का वास्तविक उद्देश्य समाज की रक्षा, सेवा और सकारात्मक परिवर्तन होना चाहिए।
अंत में उन्होंने स्वयंसेवकों से शाखा की नियमितता बनाए रखने, अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने, समाज के विभिन्न वर्गों से निरंतर संपर्क रखने तथा सेवा एवं सामाजिक परिवर्तन के कार्यों में सक्रिय सहभागिता बढ़ाने का आह्वान किया। कार्यक्रम का समग्र संदेश व्यक्ति निर्माण के माध्यम से संगठित समाज और राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के संकल्प पर केंद्रित रहा।



