कुर्सी से *ममता* किसे नहीं होती?

हरीश मिश्र, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
कुर्सी से ममता किसे नहीं होती ? कुर्सी से हटने के दो तरीके हैं—पहला संवैधानिक, दूसरा अपमानित होकर। कोलकाता में हुगली नदी का पानी और राजनीति—दोनों इस वक्त तप रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही इस नदी की गहराई का अंदाज़ा नाव की सैर करके लगा चुके हैं।
इसी तपती दोपहर में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक वक्तव्य वायरल हुआ—“इस्तीफ़ा नहीं दूंगी…” बयान छोटा है, लेकिन लोकतंत्र में इसकी उम्र बहुमत से बंधी होती है, ज़िद से नहीं।
ममता का यह कथन राजनीतिक संदेश ज़रूर हो सकता है, पर संवैधानिक सच्चाई अलग है। लोकतंत्र में कुर्सी का जनाज़ा भावनाओं से नहीं, बहुमत के कंधों पर उठता है और कब्रिस्तान में सुपुर्देखाक होता है।कुल मिलाकर लोकतंत्र संख्या से तय होता है—और यही संख्या विधानसभा के फ़र्श पर गिनी जाती है, भाषणों में नहीं।
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, तब दिन और रात होते हैं और लोकतंत्र में संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यपाल जब सक्रिय होते हैं, तब प्रदेशों की राजनीति में दिन-रात बदलते हैं। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के हाथ में एक अदृश्य तराज़ू है। यह तराज़ू भले ही राजभवन में रखा हो, उसकी डोरी कहीं न कहीं केंद्र की सत्ता से जुड़ी हैं। यही वजह है कि फ्लोर टेस्ट और सिफारिशें केवल गणित नहीं रह जातीं—उनमें “वजन” भी देखा जाता है।
ममता के इस्तीफ़ा न देने पर फ्लोर टेस्ट होगा। वहां न नारे काम आएंगे, न गुस्सा—सिर्फ़ “हाँ” और “ना” की गिनती होगी।
अब ममता का एक और रंग देखिए—इस्तीफ़े की चर्चा, इनकार के साथ। इससे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियाँ बनी रहती हैं। कहा जा रहा है कि इस्तीफ़े की बात इसलिए उछाली गई ताकि बहस चलती रहे और हुगली का पानी ठंडा न पड़े।
लेकिन पानी साफ़ है—
सुर्खियाँ कुर्सी नहीं देतीं, संख्या देती है।
संविधान दरवाज़ा खोलता है या तो इस्तीफ़ा या बर्खास्तगी।
आख़िर में बात—
लोकतंत्र में कुर्सी “मेरी” नहीं होती, “हमारी” होती है और “हम” का मतलब है,बहुमत।बयान भले ही तेवर दिखाए,
पर संविधान हमेशा बहुमत के साथ खड़ा रहता है। ममता को कुर्सी की चाह छोड़ कर पुनः सड़क पर संघर्ष करना होगा।



