क्या ऐसे सुधरेगा शिक्षा का स्तर, वातानुकूलित कमरों में बैठकर बनाते है योजनाएं
रिपोर्टर : विनोद साहू
बाड़ी। शिक्षा के स्तर में सुधार का ढांचा तैयार करने वाले गुणी विद्वानों ने भिन्न-भिन्न नामों से फौज तो खड़ी कर दी परन्तु शिक्षा का स्तर रसातल की ओर बढ़ गया। मजेदार बात यह है कि मैदानी स्तर पर जिस फौज पर शिक्षा व शाला का स्तर सुधारने का दायित्व सौंपा गया है वे ही अधिकार का रौब झाड़ कर अपना स्तर सुधारने में मशगूल हो गए। इस फौज में मैदानी स्तर पर ऐसे भी कमांडर है जिनके चरित्र पर न केवल शर्मनाक कृत्य के आरोप लगे बल्कि गबन जैसे संगीन आपराधिक कृत्य के आरोपी हैं, लेकिन ऊपर वाले की कृपा से डटे हुए हैं ।
निवृतमान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दो दशक से भी लंबे कार्यकाल में एक समय ऐसा भी आया जब गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पर जोर दिया गया। विभाग में पहले से चली आ रही जिला शिक्षा अधिकारी और उसके मातहत कर्मचारी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी और उसके मातहत कर्मचारीयों को नाकाफी मानते हुए नियंत्रण शक्ति एवं अधिकारों का बंटवारा करते हुए जनशिक्षा केन्द्र के नाम से प्रथक-प्रथक सेना खड़ी की गई इसमें जिला समन्वयक, विकासखंड समन्वयक, जन शिक्षक जैसे पद सृजित किए गए। इनके अतिरिक्त संकुल प्राचार्य के नाम से अलग पद बनाया गया। नियंत्रण निरीक्षण, कार्यवाही के अधिकारों से लैस यह भारी-भरकम फौज मैदान में उतरी नतीजतन शालाओं में अव्यवस्था का प्रवेश हो गया। शिक्षा व शाला का स्तर सुधारने वाले अधिकार पाकर षड्यंत्र, सेटिंग, धमकाने जैसे कृत्य में मशगूल होकर अपना स्तर सुधारने में लगे गये ।
नियंत्रण और निरीक्षणकर्ताओं की फौज में ऐसे भी कमांडर शामिल हैं जिनके दामन पर शर्मनाक कृत्य के आरोपों के अमिट दाग हैं । गबन जैसे संगीन आपराधिक कृत्य के आरोपी हैं लेकिन ऊपर वाले की कृपा से डटे हुए हैं। हालात ये हैं कि भारी-भरकम निरीक्षणकर्ताओं की फौज के बावजूद कई शिक्षक- शिक्षिकाऐं शाला जाते ही नहीं हैं । कई अन्यत्र स्थानों में रहकर अपना निजी व्यवसाय कर रहे हैं। कहीं भाड़े के कर्मचारी सेवाएं दे रहे हैं तो कहीं ताले ही नहीं खुल पा रहे हैं ।
ऐसी बात नहीं है कि इस सबसे निरीक्षणकर्ताओं के सदस्य और ऊपर वाले अनभिज्ञ हो परन्तु सेटिंग और षड्यंत्र की बदौलत सब चल रहा है। वातानुकूलित कमरों में बैठे ऊपर वाले कभी इस तरफ भी नजर डालेंगे या फिर ऐसे ही शिक्षा के स्तर में सुधार लाया जाएगा।



