राहुल गांधी ने टंट्या मामा को दी श्रद्धांजलि : भारत जोड़ो यात्रा की सभा में गरजे
जनजातीय सभा में बोले- जब आपके महापुरुषों को फांसी पर लटकाया गया, तब अंग्रेजों को आरएसएस का साथ था
टंट्या मामा के वंशज बोले- न पक्का मकान मिला, न गैस कनेक्शन
रिपोर्टर : तारकेश्वर शर्मा
खंडवा। एमपी में भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे दिन गुरुवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी आदिवासी जननायक टंट्या मामा की जन्मस्थली पर पहुंचे। जहां उन्होंने टंट्या मामा को श्रद्धांजलि देने के बाद जनजातीय सभा को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने आएसएस पर हमला बोलते हुए कहा कि जब आपके महापुरुषों को फांसी पर लटकाया गया, तब अंग्रेजों को आरएसएस का साथ था। राहुल गांधी ने कहा कि टंट्या मामा एक सोच और एक विचारधारा भी थे। उनकी सोच और विचारधारा के कारण मैं यहां आया हूं। 26 जनवरी को टंट्या मामा का जन्म ये भी एक संदेश है।
टंट्या मामा के वंशज बोले- न पक्का मकान मिला, न गैस कनेक्शन
मीडिया ने टंट्या भील के वंशजों से बात की तो वे सरकार से नाराज नजर आए। बातचीत में उन्होंने बताया, नेता हमारे घर आते हैं, कहते हैं आप टंट्या मामा के वंशज हो, हम आपका सम्मान करेंगे। हम लोग जाते हैं और वो हमें मंच पर बैठाते हैं। वादा करते हैं कि आपकी मदद करेंगे। अब तक ऐसे कई वादे हो चुके हैं, लेकिन निभाया किसी ने भी नहीं। ये घर की छत देख रहे हो, कभी भी गिर सकती है। बारिश में इससे पानी टपकता है। सरकार ने आज तक रत्ती भर भी मदद नहीं दी। चूल्हे पर खाना पकाते हैं। शौच के लिए बाहर जाते हैं। हमारे पास खेती के लिए जमीन थी, जिसे टंट्या मामा के स्मारक के लिए दान में दे दिया। अब मजदूरी कर जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहे हैं।
इससे पहले भाजपा सरकार ने टंट्या भील के वंशजों को बुलाकर उनका सम्मान किया था और वादे किए थे।
गांव वाले ताने मारते हैं कि तुम मंत्रियों के पास जाते हो मिलता क्या है ?
टंट्या भील के वंशज यानी जयसिंह की बहू उषाबाई बताती है कि वह आठवीं तक पढ़ी हैं। घर में शौचालय तक नहीं है, शौच के लिए दूर खेतों में जाना पड़ता है। प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ तक नहीं मिला। कच्चे और टूटे-फूटे मकान में रह रहे हैं। रोजगार नहीं है हम खेत में मजदूरी करके पेट पालते हैं। हमारे पास खेती के लिए जमीन नहीं है। जो जमीन थी वो हमारे ससुर ने टंट्या भील के मंदिर (स्मारक) के लिए दान दे दी। नेता आकर चले जाते हैं, वो मंच से सम्मान तो कर देते हैं, लेकिन मदद कुछ नहीं करते। सम्मान के रूप में हम इस अपमान के घूंट को पी रहे हैं। गांव वाले ताना मारते हैं कि तुम मंत्री मुख्यमंत्री के पास जाते हो, लेकिन तुम्हें आज तक मिला क्या है? उषाबाई के पति दिलीप बेलदारी करते हैं।
शिवराज काे बताया तब जाकर मिला खाना पकाने काम
65 वर्षीय सोनाबाई के पति जयसिंह ने ही स्मारक बनाने के लिए 2010 में जमीन दान दी थी। सोनाबाई के पास कोई काम नहीं था। बढ़ती उम्र के बीच सोनाबाई मजदूरी नहीं कर सकती थीं। वह बताती हैं कि काम के लिए अफसर-नेताओं के सामने हाथ फैलाए, फिर एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह को बताया कि कुछ काम दिलवाओ। कुछ दिनों बाद टंट्या मामा की स्मारक में छात्रावास संचालित हुआ तो यहां खाना पकाने का काम मिला। 6 हजार रुपए महीने के हिसाब से मानदेय मिलता है। पास में ही घर है, जो कच्चा है। एक बेटा मिथेन मेरे पास रहता है, दूसरा जितेंद्र गांव में अंदर रहता है। जितेंद्र लोगों के यहां खेतों में मजदूरी करता है। मिथेन काे पंधाना के हॉस्टल में चपरासी का काम मिला है।
2021 में यहीं से निकली थी जनजाति गौरव यात्रा
मध्यप्रदेश की सियासत में आदिवासी समाज का अहम योगदान रहा है। 2018 में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनाने में आदिवासियों की भूमिका थी। कई आदिवासी सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जो कि भाजपा के खाते में हुआ करती थी। यही वजह है कि कमलनाथ सरकार गिरने के बाद वापस सत्ता में आई शिवराज सरकार ने अपनी चुनावी रणनीति आदिवासियों पर केंद्रित कर दी। नवंबर 2021 में जनजाति गौरव यात्रा का आगाज टंट्या भील की जन्मस्थली से ही किया। उनकी कर्मस्थली पर पातालपानी रेलवे स्टेशन का नामकरण भी टंट्या भील के नाम पर किया गया।
अब दोबारा जनजाति गौरव यात्रा निकाली जा रही है। 20 नवंबर को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कुक्षी के डही से इसकी शुरुआत कर दी है। 23 नवंबर को यात्रा टंट्या भील की जन्मस्थली पर पहुंची। 4 दिसंबर को इंदौर के भंवरकुआं चौराहा पर टंट्या मामा की प्रतिमा का मुख्यमंत्री चौहान अनावरण करेंगे। समापन पर इंदौर के नेहरू स्टेडियम में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित होगा। इसके अलावा भी शिवराज सरकार ने जनजाति गौरव के नाम पर ग्वालियर, जबलपुर और भोपाल में बड़े आयोजन किए है। जिनकी अध्यक्षता राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कर चुके हैं।
कौन है टंट्या भील, जिनके वंशजों की बात हो रही है
मालवा और निमाड़ अंचल के लोकनायक टंट्या भील वर्ष 1878 और 1889 के बीच भारत में एक बड़े विद्रोही और क्रांतिकारी थे। टंट्या स्वदेशी आदिवासी समुदाय के भील जनजाति से ताल्लुक रखते थे।
टंट्या भील का जन्म 1840 में तत्कालीन मध्य प्रांत के पूर्वी निमाड़ (खंडवा) की पंधाना तहसील के बडाडा गांव में हुआ था। उनका असली नाम तांतिया भील था। उनकी गतिविधियों को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें ‘इंडियन रॉबिन हुड’ कहा था।
टंट्या भील की वीरता और अदम्य साहस से प्रभावित होकर तात्या टोपे ने उन्हें गुरिल्ला युद्ध में पारंगत बनाया था। इंदौर की सेना के एक अधिकारी ने टंट्या को क्षमा कराने का वादा किया था, लेकिन घात लगाकर उन्हें जबलपुर ले जाया गया, जहां उन पर मुकदमा चलाया गया।
4 दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी दे दी गई। टंट्या भील को टंट्या मामा भी कहा जाता है। उनका एक नाम टंड्रा भी था, जिन्हें प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था।



