धार्मिक

काटना शब्द बोलने में भी पाप का बंध होता हैः पंडित धन सिंह ज्ञायक

जैन चैत्यालय में आयोजित व्याख्यान में बताया बर्थ डे नही- व्यर्थ डे बोलो
सिलवानी । धर्म चर्चा में नही चर्या में होना चाहिए। चर्या में होने से जीवन सात्विक होने के साथ ही समरसता का भाव भी आता हैं। व्यक्ति को अपना जीवन सदैव ही समरस होकर जीना चाहिए।
यह उद्गार पिडावा (राजस्थान) से आए जैन धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पंडित धन सिंह ज्ञायक ने व्यक्त किए । वह नगर के तारण तरण जैन चैत्यालय में बुधवार को सुबह के समय महान अध्यात्मिक संत, श्रीमद जिन तारण तरण मंडलाचार्य महाराज द्वारा विरचित न्यान समुच्चय सार ग्रंथ पर समाजजनो को सहज व सरल भाषा में उपदेष दे रहे थे। प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे।
उन्होने बताया कि काटना शब्द भी हिंसक श्रैणी में आता है। काटना शब्द बोलना भी पाप का बंध करता हैं। काटना व बनाना अलग अलग शब्द है। काटना शब्द का आशय हिंसा करना व बनाना शब्द सब्जी को बनाने में उपयोग किया जाता है। जो कि अहिंसक होता है। किसी बस्तु की विषेषता बताने उसके गुणो को वर्णन करने पर उस बस्तु को लेकर पूर्व से ही अनुभव होता हैं। अनुभव के आधार पर ही बस्तु की विषेषता का वर्णन किया जा सकता हैं।
पंडित धन सिंह ज्ञायक ने बताया कि आचार्य कहते है कि मेरे दर्षन मन करो बल्कि आत्मा के दर्षन करो। बर्थ डे शब्द की विस्तार से व्याख्या करते हुए बताया कि जैन जिनागम में यह गलत है, निषेध है। बर्थ डे नही उसे व्यर्थ डे बोलो। बर्थ डे मनाना फूहड़ता का प्रतीक है। नव वर्ष के प्रथम दिन को नूतन दिवस कहते है। लेकिन जव आत्मा का बौध हो जावे वह दिन ही नूतन दिन होता है। कार्य एैसे करो की जन्म सार्थक हो जावे व समाज याद रखे।
द्रष्टांत के माध्यम से उन्होने बताया यह देह बहुत ही मूल्यवान है। जिसकी दिशा बदल जाती है उसकी दशा भी बदल जाती है। राजा की बातो से भिखारी की अपनी देह की महिमा का ज्ञान हो गया। षुद्व व अषुद्वता को लेकर उन्होने बताया कि जब दो बस्तुओं में मिलावट हो जाती है तो वह बस्तु अषुद्व हो जाती है। जवकि एक बस्तु कभी भी अशुद्व नही होती हैं। रात्रि में भी प्रवचन का आयोजन किया जा रहा हैं ।

Related Articles

Back to top button