धार्मिक

चित्त शुद्धि, आहार शुद्धि और वित्त शुद्धि जीवन में अनिवार्य : पंडित रेवाशंकर शास्त्री

श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा मानव कल्याण के लिए ही वेदव्यास जी ने हम सभी को प्रदान की है, मानव कल्याण से बड़ा धर्म दूसरा नहीं है

रिपोर्टर : शिवकुमार साहू
सिलवानी । ग्राम साईंखेड़ा में श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर में धनराज रघुवंशी के द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के द्वितीय दिवस पर व्यासपीठ पंडित रेवाशंकर शास्त्री ने कथा श्रवण कर रहे भक्तों से कहा कि, हमारे जीवन में हमारा आहार यदि शुद्ध होगा, तो हमारे चित्त की प्रवृत्तियां विशुद्ध होगीं। इसलिए चित्त की प्रवृतियों को पवित्र करने के लिए, शुद्ध सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए। भोज्य पदार्थों से ही हमारे मन का परिवर्तन होता है ,इसीलिए सात्विक आहार की महत्ता शास्त्रों में बताई गई है ।वर्तमान समय में अनेक विकार मन में प्रकट होने का कारण दूषित भोजन ग्रहण करने के कारण ही आ रहा है। हमारे यहां कहा भी गया है जैसा खाएंगे अन्न, वैसा बनेगा मन, मन की पवित्रता के लिए सात्विक आहार अनिवार्य है ।इसी प्रकार जीवन निर्वाह के लिए वित्त भी पवित्र होना चाहिए, वित्त की शुद्धि से हमारा जीवन निर्विघ्न होकर व्यतीत होगा ,कपट पूर्वक किसी को छल कर, धन कमाने से पारिवारिक जीवन में कष्ट की अनुभूति आ जाती है। इसीलिए जीविका के माध्यम में यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि धन पवित्र माध्यम से ही जीवन में प्राप्त हो, धन की जो गतियां हैं वह हमारे जीवन में आवश्यकता की पूर्ति यों के लिए है, लेकिन आवश्यकता से अधिक संग्रह भी उचित नहीं, और फिर धन की जो सद उपयोगिता है ,वह दान देने में है, इसलिए सुपात्र व्यक्ति को आवश्यकता अनुसार दान देना चाहिए। जो निर्धन हैं अभाव में जी रहे हैं, उनके जीवन में कष्ट है, तो उन्हें धन का दान देकर सहयोग करना मानवीय गुण है ,संसार में दीन, दुखी मनुष्य की सेवा करने से परमात्मा की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है इसलिए निर्धनों का सहयोग करना भगवान की सच्ची सेवा है ,निर्धन व्यक्ति से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करते हुए, उसके जीवन में उत्पन्न अभाव को दूर करने का प्रयास करना मानवीय धर्म है। गरीब कन्याओं का विवाह करना, जो जीविका से विमुख है उनके लिए जीवकोपार्जन के लिए धन का सहयोग करना प्रत्यक्ष पुण्य हैं। इसलिए समाज में जो धनी हैं, वह अभाव में जीवन यापन करने वाले मनुष्यों को सहयोग करके, पुण्य की प्राप्ति करें ।श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा मानव कल्याण के लिए ही वेदव्यास जी ने हम सभी को प्रदान की है, मानव कल्याण से बड़ा धर्म दूसरा नहीं है ,और दूसरे के कष्टों को दूर करने में ही हमारी प्रवृत्ति होनी चाहिए ।भगवान श्री कृष्ण ने बृज क्षेत्र की समस्त नर-नारियों को अपना सगा संबंधी मानकर उनको आनंद प्रदान किया और गोपालन करके, संदेश दिया कि गाय प्रकृति से जुड़ा हुआ प्राणी होने के साथ-साथ हमारे लिए माता के है, जिसकी सेवा करना भी हमारा परम कर्तव्य है ।

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