धर्म के नाम पर अनियंत्रित होते अधिकार : संविधान का कमजोर पक्ष

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र : लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार) स्वरदूत क्रमांक ९५८४८१५७८१
भारत के संविधान में मौलिक अधिकार के रुप में हम भारत के लोगों को अनुच्छेद 19 में स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदत्त है । ये अनुच्छेद व्यक्ति स्वतंत्रता का अधिकार पत्र है। *हम भारत के लोग अपने अधिकारों के प्रति कुछ ज्यादा ही जागरूक हैं किंतु कर्त्तव्यों से मुंह मोड़ लेते हैं।*
संविधान के द्वारा हमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्राप्त है।संविधान निर्माताओं ने ” *अधिकारों के साथ ही देश की सुरक्षा के लिए कुछ आवश्यक प्रतिबंध भी लगाए* “। उनका विचार था कि “अधिकारों का ठीक तरह से प्रयोग जनता की प्रतिभा पर निर्भर है।”
आजादी के 75 साल बाद भी भारत की जनता की एक ही प्रतिभा है। *वह देश से लेना जानती है, देश को देना नहीं। वह अधिकार जानती है, कर्त्तव्य नहीं !*
भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान में निर्धारित है किंतु *देश की सुरक्षा प्रभुसत्ता और अखंडता को कोई भी ऐरा गैरा चुनौती दे जाता है।सार्वजनिक व्यवस्था को कोई भी संगठन, व्यक्ति छिन्न-भिन्न कर देता है।* सदाचार एवं नैतिकता का पालन नहीं किया जाता। धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा को प्रोत्साहन दिया जाता है । *भारत में धर्म, पंथ, मजहब के नाम पर अधिकार अनियंत्रित हो गए हैं।* जबकि स्वतंत्रता तभी तक है जब वह कानून द्वारा संयमित हो। नागरिकों को अपने अधिकार प्राप्त करने का अधिकार है किन्तु दूसरों के अधिकारों का हनन करने का अधिकार नहीं है।
अनुच्छेद 19 (1) (क) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निहित है। यह लोकतंत्र के लिए सबसे प्रमुख अधिकार है।इस अधिकार के तहत तार्किक और आलोचनात्मक शक्ति प्रदान की गई है । शब्दों, लेखों, चित्रों, मुद्रण अथवा किसी अन्य प्रकार से अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार दिया गया है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस भी सम्मिलित है । “अभिव्यक्ति” शब्द बहुत व्यापक है ।
प्रेस की स्वतंत्रता अप्रतिबंधित है किंतु प्रेस ऐसी बातों का प्रसार में सहायक नहीं बन सकता जिससे देश में हिंसा और घृणा फैलती होती हो, सांप्रदायिकता को प्रोत्साहन मिलता हो,विघटनकारी तत्वों के हाथ मजबूत होते हों। इन परिस्थितियों में सरकार युक्ति युक्त अंकुश लगा सकती है। किंतु जून 1975 में अनावश्यक आपातकाल लगाकर प्रेस का गला घोंटा गया वह भी अनुचित ही नहीं काला कानून था ।
संविधान से प्राप्त विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की सीमा रेखा पुनः निर्धारित की जाना चाहिए । अनुच्छेद 19 (1) का संवैधानिक संशोधन जरूरी है। जिससे *विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म के नाम पर सड़कों पर शाहीन बाग जैसे प्रोपेगेंडा बंद हो सकें। संक्रमित बीमारी फैलाने वालों पर अंकुश लग सके। कुल मिलाकर 19 (1) संविधान का कमजोर पक्ष है।*



