विवेक से ही सफलता प्राप्त होती है : कमलेश कृष्ण शास्त्री
रिपोर्टर : शिवकुमार साहू
सिलवानी। ग्राम सियरमऊ में चल रही श्री गणेश पुराण कथा के तृतीय दिवस में कमलेश कृष्ण शास्त्री महाराज ने कहा कि विनम्रता से विवेक का जन्म होता है। विवेक से सत्य का और सत्य में प्रभु का निवास है। प्रभुता वहीं है जहाँ जीवन में विवेक विनम्रता है। उन्होंने कहा कि विवेक को अपना शिक्षक बनायें। कार्य को विवेक पूर्ण संपादित करना ही जीवन की सफलता है। सम्मान, शान्ति और संतोष ये विवेक के मित्र हैं, जबकि ईर्ष्या, क्रोध और चिन्ता शत्रु हैं। सबको सम्मान दें। दूसरों के लिए भी शान्ति में निमित्त बनें और भगवान की कृपा से जो कुछ मिला उसका संतोषपूर्ण आनन्द लीजिए। समृद्धि का स्रोत आत्म-सत्ता का बोध है। बड़प्पन दुःख देने में नहीं, दुःख दूर करने में है। उन्होंने कहा कि हम अपने आप में ऐसी कला विकसित करें कि दूसरों के मन की बात को समझें और अपने वचनों से दूसरों का मन जीतें, कभी किसी का दिल दुखने वाली बात ना कहें। सच्चा धार्मिक व्यक्ति न तो आपको भय देता है, न ही लोभ देता है। सच्चा धार्मिक व्यक्ति अपने जीवन को आपके सामने खोल देता है। यदि उसमें से आपको कुछ चुनना हो, चुन लीजिये। चुन लें तो धन्यवाद, न चुनें तो भी धन्यवाद। महाराज ने कहा कि श्रद्धा के अभाव में ही अकर्मण्यता और दुःख जीवन में आते हैं। तन के लिए अन्न जितना आवश्यक है, मन के लिए सत्संग भी उतना ही आवश्यक है। सत्संग की भी गंगा होती है। जो लोग गंगा में स्नान न कर सकें, वे सत्संग की गंगा में स्नान करें। सत्संग की गंगा में स्नान करने से पाप, ताप, संताप और दैन्य-सभी नष्ट हो जाते हैं। माता पार्वती श्रद्धा स्वरूपा हैं, परमात्मा शिव विश्वास स्वरूप हैं। इस संसार में रहने वाले नर-नारी में श्रद्धा एवं विश्वास सुदृढ़ होगा, तभी उनके घर में पुरुषार्थरुपी कार्तिकय एवं विवेकरुपी श्रीगणेश की उत्पत्ति होगी। इस प्रकार विश्वास और श्रद्धा के मिलन से ही परमात्मा का प्राकट्य होता है।



