धार्मिकमध्य प्रदेश

सर्वज्ञ स्वरुपी आत्मा शास्वत सम्यग शुद्व है ज्ञानमय शुद्वात्मा सम्यग दर्शन रुप है : पंडित धन सिंह ज्ञायक

व्याख्यान में सदाचार को जीवन में अपनाने पर दिया जोर
सिलवानी । जो वस्तु अनादि अनंत है उसे अनादि अनंत रुप में ही जाना जाएगा । जबकि सर्वज्ञ स्वरुपी आत्मा शास्वत सम्यग शुद्व है ज्ञान मय शुद्वात्मा सम्यग दर्शन रुप है।

यह उद्गार पिडावा (राजस्थान) से आए जैन धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पंडित धनसिंह ज्ञायक ने व्यक्त किए । वह नगर के तारण तरण जैन चैत्यालय में शुक्रवार को सुबह के समय महान अध्यात्मिक संत, श्रीमद जिन तारण तरण मंडलाचार्य महाराज द्वारा विरचित न्यान समुच्चय सार ग्रंथ पर समाजजनो को सहज व सरल भाषा में उपदेश दे रहे थे । प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे।
उन्होने बताया कि जीवन में सदाचार व संस्कारो का होना अति आवष्यक होता हैं। जिसके जीवन मेें सदाचार नही है। व संस्कारो का बीजारोपण नही हुआ है। वह संस्कार रहित कहलाता हैं । संस्कार विहीन व्यक्ति का जीवन नारकीय हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सदाचार व संस्कार होना आवष्यक है। संस्कार वान व्यक्ति ना केवल अपने परिवार की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। बल्कि जीवन में सफलता के सोपान भी तय करता है। साथ ही समाज में भी सम्मान पाता है। आचरण शुद्व होने से ही कल्याण होता हैं।
पंडित धन सिंह ज्ञायक ने बताया कि ज्ञायक स्वरुपी भगवान आत्मा ही अनंत है। उन्होने बताया कि जैन धर्म बैज्ञानिक धर्म है। जिसकी बैज्ञानिकता को वर्तमान समय की बैज्ञानिकता चुनौती दे रही है। हजारो साल पूर्व आचार्यो ने कहा था कि पंचम काल में घर घर में भूत नाचेगें। उस समय कही बात आज सिद्व हो रही है। आज टीवी (टेली विजन)व मोबाईल के माध्यम से घरो में पाष्चात्य संस्कृति के फूहड़ता से युक्त कार्यक्रम देखे जा रहे है। यह कार्यक्रम भूत प्रेत युक्त होते है साथ ही काल्पनिक भी होते है।
सीरियल शब्द का विस्तार से विवेचन कर बताया कि टीवी पर आने वाले सीरियल वास्तविक सीरियल नही है। बल्कि वास्तविक सीरियल तो अपने शुद्वात्मा को देखना है। पंडित श्री ज्ञायक ने बताया कि जिन मंदिर चैत्यालय में कभी भी अस्वच्छ, रंग बिरंगे, पाष्चात्य सभ्यता से परिपूर्ण बस्त्र पहन कर नही जाना चाहिए । बल्कि साफ शुद्व, सफेद बस्त्र पहन कर ही धर्म स्थल पर प्रवेष करना चाहिए।

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