वर्तमान जटिल परिस्थितियों से मुक्ति का मार्ग श्रीमद् भागवत कथा में निहित है : पंडित रेवाशंकर शास्त्री
भागवत कथा मोक्ष प्रदान करने वाली है ।
सिलवानी । वर्तमान मानव जीवन में परिस्थितियां बहुत जटिल हो गई हैं।व्यक्ति के जीवन में अनेक परेशानियां आ गई हैं जिनके निदान की खोज में व्यक्ति किंकर्तव्य विमूढ़ होकर दु:खी हो जाता है और उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। तो उसे श्रीमद् भागवत की कथा सुनने के लिए जाना चाहिए। जहां पर उसकी समस्त समस्याओं का निदान अपने आप हो जाता है।
उक्त उद्गार पंडित रेवाशंकर शास्त्री ने व्यक्त किए। वह ग्राम रोसरारानी मे हनुमत सिंह रघुवंशी फौजदार की पुण्य स्मृति में परिजन राजेंद्र रघुवंशी एवं फौजदार परिवार द्वारा कराई जा रही श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस के अवसर पर बुधवार को कार्यक्रम में उपस्थित श्रृद्वालुओं को संबोधित करते हुए भागवत कथा का महत्व बताया। भागवत कथा मनुष्य को मोक्ष प्रदान करने वाली है । उन्होने बताया कि जब महाराज परीक्षित के जीवन में विकराल समस्या उत्पन्न हुई कि सात दिन बाद इस संसार को वह त्याग देंगे और तक्षक के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी । तो वह पश्चाताप और संशय की स्थिति में वह पहुंच गए और इसके निदान के लिए उन्होंने गंगा के तट का आश्रय लिया।
कथावाचक ने बताया कि श्रीमद् भागवत महापुराण में कहा है कि यह संसार सागर ऐसा है जिसका एक किनारा तो दिखाई दे रहा है लेकिन दूसरा किनारा व्यक्ति को दिखाई नहीं देता है और दूसरा जो तट है वह संसार रूपी समुद्र का अदृश्य है। उस अदृश्य तट की खोज हमें भगवान के विग्रह स्वरूप श्रीमद्भागवत के श्रवण करने से प्राप्त हो पाऐगा । इसीलिए सांसारिक मायामोह को त्याग कर सांसारिक जटिलताओं परिस्थितियों और परेशानियों को अपने जीवन को नष्ट करने वाला मानकर व्यक्ति यदि इनमें पड़ जाएगा तो वह बहुत उलझ जाएगा। इसीलिए प्रयास करना चाहिए कि हम इन से मुक्त होकर आत्म विकास का मार्ग किस प्रकार हम को प्राप्त हो। इस दिशा में चिंतन करना चाहिए।
कथा वाचक पंडित रेवाशंकर शास्त्री ने बताया कि हमारी संस्कृति में शास्त्र का आश्रय लेकर व्यक्ति अपने आत्म विकास को प्राप्त कर सकता है। और जहां बात श्रीमद् भागवत महापुराण की आती है तो यह कलयुग में श्री भगवान का विग्रह स्वरूप है । इस स्वरूप का आश्रय लेकर हम इस संसार से पार जा सकते हैं। वास्तविक अर्थों में पूछा जाए तो जो अनंत समुद्र रूपी संसार का अदृश्य तट है वह हमें प्राप्त हो जाता है और उसे प्राप्त करके हम सांसारिक मायामोह भौतिक कष्टों से मुक्त होकर परमात्मा प्राप्ति की ओर उन्मुख हो जाते हैं । जहां तक वर्तमान परिस्थितियों की बात है तो वह व्यक्ति को केवल भटकाती हैं। निदान उन भौतिक संसाधनों में कदापि नहीं है तो भौतिकता को त्याग कर आध्यात्मिक उन्नति आत्म चेतना के जागरण का प्रयास मानव को अपने जीवन काल में अवश्य कर लेना चाहिए। मानव की इंद्रियों की बात जहां तक है तो यदि इंद्रियों में शिथिलता आ जाएगी तो आध्यात्मिक जागरण भी संभव नहीं हो पाएगा इसलिए जब तक भौतिक इंद्रियां स्वास्थ्य हैं तो आध्यात्मिक जागरण का प्रयास भी इसी अवधि में मनुष्य को कर लेना चाहिए ।

