मध्य प्रदेशराजनीति

आज से भोजपुर चुनाव की शुरुआत, बागियों ने नहीं दिखाये तैबर

रिपोर्टर : विनोद साहू
बाड़ी । किस्मत करे जोर तो कोंदो नीदें चोर यह कहावत कहानियों में बहुत सुनी थी और राजनीति में इसकी सफलता भी देख चुके हैं।
भोजपुर विधानसभा चुनाव का आगाज़ तो टिकट वितरण के समय ही हो गया लेकिन नवरात्रि होने से चुनावी हलचल शुन्य थी अब दशहरा पर्व भी निकल गया और काँग्रेस के उम्मीदवार आज गुरुवार को अपना पर्चा दाखिल करने समर्थकों के साथ गौहरगंज पहुँचकर पर्चा भरेंगे।
राजनेताओं ने फैलाया जातिवाद बन रहा उन्हीं की मुसीबत।
देश प्रदेश में भले ही संविधान और लोकतंत्र की बात कही जाती हो लेकिन राजनीतिक दलों ने इस लोकतंत्र के महापर्व को भी अपने ही हिसाब से सेट कर दिया.. अगर बाहरी नेता आ जाए तो उसके लिए कोई जाति या धर्म महत्वहीन हो जाता बह सिर्फ पार्टी का उम्मीदवार बनकर रह जाता हैं .अगर क्षेत्रीय उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरता हैं तो उसे जातिवाद का चेहरा घोषित करने देर नहीं करते ।
भाजपा ने खुद ही फंसाई सुरक्षित सीट ।
पंद्रह दिन पहले ही काँग्रेस ने राजकुमार पटेल बकतरा को भोजपुर से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया लेकिन भाजपा से उम्मीदवार घोषित न होने पर चुनावी चर्चाओं पर बिराम ही रहा । लेकिन जब भाजपा ने अंतिम सूची में भोजपुर से पुनः सुरेंद्र पटवा को उतारा तो क्षेत्र की जनता आश्चर्य चकित और हतप्रद रह गई क्योंकि इस बार पटवा जी के विरुद्ध क्षेत्र में असंतोष की लहर चल रही थी और भाजपा के क्षेत्रीय नेताओं को पूर्ण भरोसा ही नहीं विश्वास था कि इस बार हमें मौका मिलेगा क्योंकि भाजपा ने भोजपुर को होल्ड पर रखकर क्षेत्रीय उम्मीदवारों के सपने जगा दिए थे लेकिन जैसे ही सुरेंद्र पटवा का नाम घोषित हुआँ सभी क्षेत्रीय उम्मीदवार कौमा में चले गए। जो चुनावी दंगल में इनकी भूमिका भी संदिग्ध हो गई और चुनाव परिणाम में क्या असर होगा यह 3 दिसंबर को ही सामने आयेगा।
काँग्रेस की राह नहीं आसान , जातिवाद के दमपर फतह मुश्किल।
प्रदेश में चाहे पंच का चुनाव हो या प्रधान (लोकसभा) का वास्विकता में जनता को कोई सरोकार नहीं होता उसे तो महज वोट डालने भर से मतलब होता जो बह डाल देता हैं , छोटे चुनाव में तो उसे शराब कबाब और हजार पाँच सो रुपये मिल ही जाते हैं लेकिन बड़े चुनाव में बह बिड़ीयों से भी उधार रहता हैं । लेकिन घाध नेताओं के लिए यह लोकतंत्र का पर्व धन बर्षा लेकर आता हैं छुटभैया नेता इस मौसम के मिजाज को आँकलन कर दिन के उजाले में पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ता नजर आते हैं और रात के अंधेरे में सौदागर बन जाते हैं । विगत चुनावी परिणाम इसकी पुष्टि करता हैं । अब यह समझना उम्मीदवार के विवेक के ऊपर हैं कि वह किस तरह अपने और पराये में पहचान कर उन्हें जिम्मेदारी सौंपे। क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार जो गर्म है उस पर विश्वास करें तो जातिवाद के दमपर काँग्रेस फतह पा जाए यह संभव नहीं दिखाई देता हैं। अब यह चुनाव नेताओं के काबू से बाहर हो चुका खामोश जनता ही
हार जीत का निर्णय करेगी इस बार जनता नेताओं के बहकावे में नहीं आने वाली वह अपना हित स्यंव चुनेगी।

Related Articles

Back to top button