
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
मंगलवार 03 फरवरी 2026
हनुमान जी का मंत्र : हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ।*
🌌 दिन (वार) – मंगलवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से उम्र कम होती है। अत: इस दिन बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए ।
मंगलवार को हनुमान जी की पूजा और व्रत करने से हनुमान जी प्रसन्न होते है। मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा एवं सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए।
मंगलवार को यथासंभव मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करके उन्हें लाल गुलाब, इत्र अर्पित करके बूंदी / लाल पेड़े या गुड़ चने का प्रशाद चढ़ाएं । हनुमान जी की पूजा से भूत-प्रेत, नज़र की बाधा से बचाव होता है, शत्रु परास्त होते है।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
👸🏻 शिवराज शक 352
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – उत्तरायण
🌧️ ऋतु – सौर बसंत ऋतु
⛈️ मास – फाल्गुन मास
🌔 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📅 तिथि – मंगलवार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष द्वितीया द्वितीया तिथि 12:40 AM तक उपरांत तृतीया
✏️ तिथि स्वामी – द्वितीय तिथि (दूज) के स्वामी ब्रह्मा जी हैं, जिन्हें विधाता भी कहा जाता हैं, इसका विशेष नाम ‘सुमंगला’ है। यह भद्रा संज्ञक तिथि है।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र मघा 10:10 PM तक उपरांत पूर्व फाल्गुनी
🪐 नक्षत्र स्वामी – मघा नक्षत्र का स्वामी ग्रह केतु है। तथा जिसका स्वामी सूर्य है। और इस नक्षत्र के देवता पितृ (पूर्वज) हैं।
⚜️ योग – शोभन योग 02:38 AM तक, उसके बाद अतिगण्ड योग
⚡ प्रथम करण : तैतिल 01:12 PM तक
✨ द्वितीय करण : गर 12:41 AM तक, बाद वणिज
🔥 गुलिक काल : मंगलवार का गुलिक दोपहर 12:06 से 01:26 बजे तक।
🤖 राहुकाल (अशुभ) – दोपहर 15:19 बजे से 16:41 बजे तक। राहु काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
⚜️ दिशाशूल – मंगलवार को उत्तर दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो कोई गुड़ खाकर यात्रा कर सकते है।
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 05:49:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 05:43:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:23 ए एम से 06:16 ए एम तक
🌇 प्रातः सन्ध्या : 05:50 ए एम से 07:08 ए एम तक
🌟 अभिजित : 12:13 पी एम से 12:57 पी एम तक
🔯 विजय मुहूर्त: 02:24 पी एम से 03:08 पी एम तक
🏙️ सायाह्न सन्ध्या, : 18:02 पी एम से 19:20 पी एम तक
🐃 गोधूलि : 05:59 पी एम से 06:26 पी एम तक
💧 अमृत काल : 07:50 पी एम से 09:24 पी एम तक
🗣️ निशिता मुहूर्त : 12:09 पी एम से 01:01 ए एम (04 फरवरी)
🚓 यात्रा शकुन-दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ अं अंगारकाय नम:।
💁🏻♀️ आज का उपाय-देवी मन्दिर में सवाकिलो अनार चढ़ाएं।
🌴 वनस्पति तंत्र उपाय- खैर के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – वागीश्वरी जयंती/ देवी सरस्वती प्राकट्योत्सव/ गौरी तृतीया व्रत/ रजब (मुस्लिम) महीना शुरू/ उर्स मोईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) शुरू/ गण्ड मूल/ आडल योग/ विडाल योग/ राष्ट्रीय महिला चिकित्सक दिवस, अभिनेत्री वहीदा रहमान जयन्ती, भारतीय अभिनेत्री दीप्ति नवल जन्म दिवस, अभिनेत्री रीमा लागू जन्म दिवस, भारतीय रिज़र्व बैंक के 23वें गवर्नर रघुराम राजन जन्म दिवस, गोल्डन रिट्रीवर दिवस, राष्ट्रीय लापता व्यक्ति दिवस, राष्ट्रीय विवाह अंगूठी दिवस, राष्ट्रीय महिला चिकित्सक दिवस, क्रूज यात्रा दिवस, संगीत का थमने का दिन, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थापना दिवस, स्वतंत्रता सेनानी सुहासिनी गांगुली जयन्ती, राखी सावंत जन्म दिवस, हरियाणा के मुख्यमंत्री हुक्म सिंह स्मृति दिवस, वन अग्नि सुरक्षा दिवस (सप्ताह)
✍🏼 तिथि विशेष – द्वितीय तिथि को कटोरी फल का तथा तृतीया तिथि है नमक का दान और भक्षण दोनों ही त्याज्य है। द्वितीय तिथि सुमंगला और कार्य सिद्धकारी तिथि मानी जाती है। इस द्वितीय तिथि के स्वामी भगवान ब्रह्मा जी को बताया गया है। यह द्वितीय की तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह द्वितीय तिथि शुक्ल पक्ष में अशुभ तथा कृष्ण पक्ष में शुभ फलदायिनी होती है।
🪬 Vastu tips 🧿
किन लोगों को नहीं पहनना चाहिए माणिक्य रत्न परीक्षा ग्रंथ के अनुसार, माणिक्य जितना प्रभावशाली है, उतना ही संवेदनशील भी है। यदि कुंडली में सूर्य प्रतिकूल स्थिति में हो, तो इसे पहनने से सिरदर्द, आंखों में जलन या अहंकार बढ़ सकता है। माणिक्य को हीरा, नीलम या गोमेद के साथ पहनने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि ये ग्रह आपस में शत्रु माने जाते हैं।
माणिक्य धारण करने की सही विधि माणिक्य को सोने या तांबे की अंगूठी में पहनना सबसे उत्तम माना जाता है। इसे रविवार सुबह सूर्योदय के समय गंगाजल और कच्चे दूध से शुद्ध करके दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।
♻️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
कचनार की जड़ का प्रयोग
पाउडर के रूप में: पुराने कचनार के पेड़ की जड़ को सुखाकर पाउडर बनाएं और प्रयोग करें। माना जाता है कि पेड़ जितना पुराना, उसकी जड़ में उतने अधिक औषधीय गुण होते हैं।
लेप के रूप में: कचनार की सूखी जड़ का पाउडर हल्दी और नारियल के तेल में मिलाकर प्रभावित हिस्से पर लगाया जा सकता है। यह धीरे-धीरे मस्सों को सूखने और गायब होने में मदद करता है।
🤏🏼 ध्यान दें: किसी भी प्रयोग से पहले चिकित्सक से सलाह लेना अनिवार्य है।* 👉🏼 कचनार के अन्य औषधीय उपयोग*
कचनार के फूल: डायबिटीज नियंत्रण में सहायक।* कचनार की छाल: अन्य रोगों में उपयोगी। कचनार के फूल का पाउडर बाजार में आसानी से उपलब्ध है। 💉 आरोग्य संजीवनी 💊
पैरों की बिवाइयां (एड़िया फटने) के कुछ घरेलू इलाज👇* रात्रि में सोने से पहले पैरों को हल्के गर्म पानी में साधारण नमक (दो गिलास पानी में एक चम्मच नमक या कच्ची फिटकरी का बारीक पाउडर) डालकर उसने पैरों को 5 से10 मिनट तक डुबोकर, सेंक करें। उसके बाद खुरदरे तौलिए से रगड़ कर मृत त्वचा को निकालकर पैर साफ कर ले। 25 ग्राम देसी मोम (शहद के छत्ते का प्राकृतिक मोम) और 50 ग्राम तिल के तेल को मिलाकर गर्म करें, अच्छी तरह मिल जाने पर इस मिश्रण को किसी चौड़े मुख्य शीशी में भरकर रख लें उपरोक्त विधि से पैरों को साफ करने के पश्चात, इस मिश्रण को फटी बिवाईयों में भर लें 1 सप्ताह में फायदा नजर आएगा। उपरोक्त तरीके से पैर साफ करने के बाद फटी त्वचा तथा बिवाईयों पर रोज सोने से पहले दो-तीन मिनट तक अरंड के तेल की मालिश करें। शरीर के किसी भी भाग की त्वचा फटने से सभी बिवाईयों पर एरंड के तेल की मालिश करने से शीघ्र लाभ होता है। *पांव की उंगलियों में निकलने वाले गिट्टों (corns) पर रोज प्रात: और रात्रि सोते समय अरंड के तेल से धीरे-धीरे दो-तीन मिनट मालिश करते रहें ताकि तेल उसमें शोषित हो जाए ऐसा करने से तीन चार सप्ताह में गिट्टे बिल्कुल समाप्त हो जाते हैं।
पैरों पर जैतून, अरंडी, बादाम के तेल की मालिश ज्यादा और शीघ्र फायदा करती है उसके बाद आप जुराब पहन सकते हैं
सरसों के तेल में मोम डालकर पिघला लें, फिर थोड़ा कपूर डालें, फिर थोड़ा गर्म करके ठंडा होने पर रोज अपनी एड़ियों पर लगाएं, जल्दी ही फायदा होगा।
📖 *गुरु भक्ति योग* 🕯️
सोलह_सोमवार व्रत कथा: एक चमत्कारिक यात्रा 🔱
“असंभव को भी संभव कर दे, ऐसी महिमा है मेरे #भोलेनाथ की।”* एक बार की बात है, देवों के देव महादेव और जगत जननी माता पार्वती भ्रमण करते हुए मृत्युलोक (पृथ्वी) के अमरावती नगर में पधारे। वहां के राजा ने शिव जी का एक अत्यंत भव्य और शांत मंदिर बनवाया था। वह स्थान इतना रमणीय था कि शिव-शक्ति वहीं ठहर गए।*
🎲 चौसर का खेल और पुजारी का झूठ:* एक दिन माता पार्वती ने कौतुकवश शिवजी से कहा, “स्वामी! आज चौसर खेलने का मन है।”*
खेल आरंभ हुआ। पांसे फेंके जाने लगे। उसी समय मंदिर का पुजारी संध्या आरती के लिए भीतर आया।* माता पार्वती ने हंसी में पुजारी से पूछा, “पुजारी जी! जरा भविष्य बताइये, इस खेल में जीत किसकी होगी?”*
पुजारी शिव-भक्त थे, उन्होंने बिना खेल की स्थिति देखे, भक्ति के आवेश में कह दिया, “देवी! जीत तो त्रिलोकीनाथ बाबा भोलेनाथ की ही होगी।”* लेकिन जब खेल समाप्त हुआ, तो विजय माता पार्वती की हुई। पुजारी का झूठ पकड़ा गया। माता पार्वती ने क्रोधित होकर कहा, “जिस पुजारी की वाणी में सत्य नहीं, वह पुजारी कैसा? जाओ, मैं तुम्हें कोढ़ी होने का श्राप देती हूँ।”*
देखते ही देखते पुजारी का शरीर रोगग्रस्त हो गया। नगर के लोग उनसे घृणा करने लगे और वे एकाकी जीवन जीने को विवश हो गए।* दुःख के दिन बीत रहे थे। एक दिन देवलोक की कुछ अप्सराएं मंदिर में दर्शन हेतु आईं। पुजारी की दयनीय दशा देख उन्होंने कारण पूछा। पुजारी ने रोते हुए अपनी भूल बताई।*
तब अप्सराओं ने उन्हें सांत्वना दी और ‘सोलह सोमवार’ के चमत्कारिक व्रत का विधान बताया:
📝 व्रत की विधि (ध्यानपूर्वक पढ़ें):
सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाएं और उसके तीन बराबर हिस्से करें।
प्रदोष काल में शिव जी के समक्ष घी का दीपक जलाएं। बेलपत्र, अक्षत, फूल, भांग, धतूरा और जनेऊ से विधिवत पूजा करें।
चूरमे के तीन हिस्सों में से एक हिस्सा भगवान को अर्पण करें, दूसरा हिस्सा प्रसाद रूप में लोगों में बांट दें और तीसरा हिस्सा स्वयं प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।
ऐसा सोलह सोमवार तक करें। 17वें सोमवार को पांच सेर आटे का चूरमा बनाकर भोग लगाएं और विसर्जन करें।
पुजारी ने पूरी श्रद्धा से यह व्रत किया और शिव कृपा से वे पुनः निरोगी और कांतिवान हो गए।* कुछ समय बाद शिव-पार्वती पुनः उस मंदिर में आए। पुजारी को स्वस्थ देख माता ने आश्चर्य से इसका कारण पूछा। पुजारी ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई।*
माता पार्वती ने भी यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से कार्तिकेय जी (जो उनसे नाराज होकर दूर गए थे) स्वयं माता के आज्ञाकारी हो गए।* कार्तिकेय जी ने जब माता से इस परिवर्तन का कारण पूछा, तो उन्हें भी व्रत का पता चला। उन्होंने भी यह व्रत किया, जिससे उनका बिछड़ा हुआ प्रिय मित्र उन्हें वापस मिल गया।*
उस मित्र (ब्राह्मण) ने जब यह राज़ जाना, तो उसने विवाह की कामना से यह व्रत किया।* वह ब्राह्मण मित्र एक अन्य देश गया जहां स्वयंवर हो रहा था। राजा की प्रतिज्ञा थी कि हथिनी जिसके गले में माला डालेगी, वही राजकुमारी का वर होगा। शिव कृपा देखिये! हथिनी ने तमाम राजकुमारों को छोड़कर उस ब्राह्मण के गले में माला डाल दी। उसका विवाह राजकन्या से हो गया।*
समय बीता, राजकन्या को उस व्रत के बारे में पता चला तो उसने पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत किया। उसे सर्वगुण संपन्न पुत्र मिला।* बड़े होकर पुत्र ने राज्य प्राप्ति के लिए व्रत किया और चमत्कार देखिए—एक पड़ोसी राजा (जिसका कोई वारिस नहीं था) ने उसे अपनी कन्या और अपना पूरा राज्य सौंप दिया।*
अब वह ब्राह्मण पुत्र राजा बन गया। वह नियम से सोलह सोमवार का व्रत करता था।* एक दिन उसने अपनी पत्नी (रानी) से कहा, “आज सोमवार है, शिवालय चलो।”*
रानी ने अहंकार और आलस्य के कारण खुद न जाकर दासियों के हाथ पूजा की सामग्री भिजवा दी।* राजा ने जब पूजा पूर्ण की, तो आकाशवाणी हुई:*
“हे राजन! अपनी इस रानी को महल से निकाल दे, इसने मेरे प्रसाद का अपमान किया है। यदि तूने ऐसा नहीं किया, तो तेरा सर्वनाश हो जाएगा।”* प्रभु की आज्ञा और राज्य की रक्षा के लिए राजा ने भारी मन से रानी को वन में छुड़वा दिया।*
रानी अब अकेली थी। उसका दुर्भाग्य उसके साथ चल रहा था:* एक बूढ़ी अम्मा ने उसे सूत बेचने भेजा, तो आंधी में सूत उड़ गया। बुढ़िया ने उसे भगा दिया।*
वह एक तेली के पास गई, तो उसके मटके चटक गए।* प्यासी होकर नदी पर गई, तो नदी का जल सूख गया।*
सरोवर पर हाथ लगाया, तो पानी में कीड़े पड़ गए।* हताश रानी एक आश्रम में पहुंची। वहां के गोसाई जी (संत) ने उसे अपनी बेटी की तरह रखा। लेकिन वहां भी रानी जिस चीज को छूती, वह खराब हो जाती। गोसाई जी समझ गए कि यह किसी साधारण दोष का परिणाम नहीं है।*
उन्होंने पूछा, “बेटी, किस देवता का अपराध किया है?”* रानी ने रोते हुए शिव प्रसाद के अपमान की बात बताई।*
गोसाई जी ने कहा, “बेटी, महादेव दयालु हैं। तुम वही सोलह सोमवार का व्रत पूरी श्रद्धा से करो।”* रानी ने वन में रहकर पूरी निष्ठा से सोलह सोमवार का व्रत किया। 17वें सोमवार को व्रत पूर्ण होते ही राजा के मन में रानी की याद आई। उसने तुरंत दूतों को खोज में भेजा।*
दूतों ने आश्रम में रानी को पाया। राजा स्वयं उसे लेने आए। गोसाई जी से आज्ञा लेकर वे रानी को वापस महल ले आए। पूरे नगर में दीप जलाए गए, खुशियां मनाई गईं।_*
शिव जी की कृपा से राजा-रानी ने पूरा जीवन सुख से बिताया और अंत में शिवलोक को प्राप्त हुए।
👉🏼 यह कथा सिखाती है कि ईश्वर धन-दौलत के नहीं, श्रद्धा और भाव के भूखे हैं। प्रसाद का अपमान, ईश्वर की कृपा का अपमान है। जो मनुष्य सच्चे मन से सोलह सोमवार का व्रत करता है, महादेव उसकी हर असंभव मनोकामना को पूर्ण करते हैं।
🌸 हर हर महादेव! जय भोलेनाथ।
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⚜️ प्रजापति व्रत दूज को ही मनाया जाता है तथा किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले एवं ज्ञान प्राप्ति हेतु ब्रह्मा जी का पूजन आवश्यक करना चाहिए। वैसे तो मूहूर्त चिंतामणि आदि ग्रंथों के अनुसार द्वितीय तिथि अत्यंत शुभ फलदायिनी तिथि मानी जाती है। परंतु श्रावण और भाद्रपद मास में इस द्वितीया तिथि का प्रभाव शून्य हो जाता है। इसलिए श्रावण और भद्रपद की द्वितीया तिथि को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।



