धार्मिक

जब स्वार्थ और तुलना भाईचारे से बड़े हो जाते हैं : कमलेश कृष्ण शास्त्री

बेगमगंज । ग्राम साजखेड़ा में चल रही श्री‌शिव महा पुराण कथा के प्रथम दिवस में पं कमलेश कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने कहा का
सगे भाइयों के बीच दरार का विषय हमारे धर्मग्रंथों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और उनसे हमें जीवन की गहरी शिक्षा मिलती है। महाभारत में कौरव और पांडव एक ही कुल में जन्मे, एक ही गुरु से शिक्षित और रक्त संबंध से जुड़े हुए थे, फिर भी ईर्ष्या, अहंकार, राज्य के लोभ और शकुनि जैसे बाहरी दुष्प्रभाव ने उनके बीच ऐसी दूरी पैदा की कि अंततः महायुद्ध में पूरा वंश विनाश की ओर बढ़ गया। यह प्रसंग सिखाता है कि जब स्वार्थ और तुलना भाईचारे से बड़े हो जाते हैं, तो घर ही कुरुक्षेत्र बन जाता है। इसी प्रकार रामायण में बालि और सुग्रीव के बीच मात्र एक गलतफहमी और संवाद की कमी ने प्रेम को वैर में बदल दिया, जबकि उसी ग्रंथ में राम और भरत का आदर्श उदाहरण यह दर्शाता है कि त्याग, धर्म और सम्मान पर आधारित भाईचारा अमर हो जाता है, क्योंकि भरत ने सिंहासन ठुकराकर भाई के अधिकार को सर्वोपरि माना।
इन्हीं शिक्षाओं को आज के संदर्भ में समझाते हुए अपने प्रवचनों में बार-बार यह संदेश देते हैं कि परिवार का विघटन तभी होता है जब अहंकार, लालच और अविश्वास हृदय में स्थान बना लेते हैं; वे बताते हैं कि भाइयों का संबंध केवल रक्त का नहीं, बल्कि संस्कार और आत्मीयता का बंधन है, जिसे संवाद, क्षमा और त्याग से ही सुरक्षित रखा जा सकता है। उनके अनुसार यदि परिवार में मतभेद उत्पन्न हों भी, तो उन्हें न्याय, धर्म और आपसी सम्मान के आधार पर सुलझाना चाहिए, अन्यथा वही घर जो प्रेम का मंदिर होना चाहिए, विवाद का क्षेत्र बन सकता है। इस प्रकार पुराणों की शिक्षा और संतों का मार्गदर्शन हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अपने परिवार को जोड़कर रखें, क्योंकि सच्ची समृद्धि संपत्ति में नहीं, बल्कि एकता में होती है।
ईर्ष्या परिवार को तोड़ती है।
अहंकार रिश्तों का सबसे बड़ा शत्रु है।
संवाद हर संकट का समाधान है।
त्याग रिश्तों को अमर बना देता है।
बाहरी दुष्प्रभाव से सावधान रहना चाहिए।
कौरव और पांडव – ईर्ष्या से विनाश तक
सगे भाई ही थे — एक ही कुल, एक ही गुरु, एक ही परंपरा।
लेकिन जब मन में ईर्ष्या ने स्थान लिया, तब विनाश का बीज बोया गया।
दुर्योधन का अहंकार और असुरक्षा की भावना, पांडवों की प्रतिभा से तुलना —
यही वह चिंगारी थी जिसने महायुद्ध को जन्म दिया।
जायदाद का विवाद (हस्तिनापुर का राज्य), सम्मान की लड़ाई,
और बाहरी लोगों (शकुनि) का दुष्प्रभाव — इन सबने मिलकर भाइयों को युद्धभूमि में खड़ा कर दिया। परिणाम? पूरा वंश नष्ट हो गया।
यह उदाहरण सिखाता है —
जब संवाद की जगह षड्यंत्र ले लेता है, और प्रेम की जगह अहंकार आ जाता है, तो भाई-भाई का रिश्ता भी रक्तपात में बदल सकता है।
सुग्रीव और बालि – गलतफहमी का परिणाम। वानरराज बालि और सुग्रीव भी सगे भाई थे।
दोनों में प्रेम था, परंतु एक गलतफहमी ने उन्हें शत्रु बना दिया।
बालि ने समझा कि सुग्रीव ने उसे धोखा दिया।
सुग्रीव भयभीत होकर अलग हो गया।
एक संवाद की कमी ने रिश्ते को तोड़ दिया।
यदि उस समय शांतिपूर्वक बातचीत होती, तो शायद युद्ध न होता।
यह प्रसंग बताता है गलतफहमी रिश्तों की सबसे बड़ी दुश्मन है। राम और भरत – आदर्श भाईचारे का उदाहरण
(रामायण) जहाँ एक ओर दरार के उदाहरण हैं, वहीं आदर्श भी हैं।
जब श्रीराम को वनवास मिला, तो भरत चाहते तो सिंहासन स्वीकार कर सकते थे।
लेकिन उन्होंने सत्ता को ठुकराकर भाई के चरणों को स्वीकार किया।
उन्होंने राज्य चलाया — पर राम के नाम से। चरण पादुका को सिंहासन पर रखकर यह संदेश दिया कि भाई का अधिकार, भाई का ही है। यह त्याग और प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है।
हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष – शक्ति का अहंकार (भागवत पुराण) दोनों भाई असुर कुल में थे, अत्यंत शक्तिशाली। लेकिन शक्ति और अहंकार ने उन्हें धर्म से दूर कर दिया। अहंकार का अंत सदैव विनाश में होता है।
यह कथा बताती है कि जब धर्म और संतुलन खो जाता है, तब परिवार भी नहीं बचता।
रिश्ते बचाइए… क्योंकि भाई केवल खून का नहीं, आत्मा का संबंध होता है।

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