जैन दर्शन आत्म दर्शन का धर्म है प्रदर्शन का नही- पंडित धनसिंह ज्ञायक
संपूर्ण ज्ञान का सार न्यान समुच्चय सार में बताया गया है।
सिलवानी। पंच परमेष्ठी हमें परमात्मा बनने की प्रेरणा देते है। जबकि मॉ जिनवाणी हमें परमात्मा बनने की विधि बताती है। बल्कि गुरु परमात्मा से साक्षात्कार करातें है। संपूर्ण ज्ञान का सार आचार्य तारण स्वामी द्वारा विरचित ग्रंथ न्यान समुच्चय सार में बताया गया है।
यह उद्गार पिडावा (राजस्थान) से आए जैन धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पंडित धनसिंह ज्ञायक ने व्यक्त किए । वह नगर के तारण तरण जैन चैत्यालय में गुरुवार को सुबह के समय महान अध्यात्मिक संत, श्रीमद जिन तारण तरण मंडलाचार्य महाराज द्वारा विरचित न्यान समुच्चय सार ग्रंथ पर समाजजनो को सहज व सरल भाषा में उपदेश दे रहे थे । प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। रात्रि के समय भी प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं।
उन्होने बताया कि यह ज्ञान स्व को भी जानता है। पर को भी जानता है। ज्ञान ग्रहण पूर्वक होता है। कहना सम्यग ज्ञान है मानना मिथ्यात्व है। ज्ञानी की जो परिणति बाहर जाती है वह परिणति यह कहती है कि मेरा घर बिगड़ रहा है। पंडित जी ने बताया कि स्वभाव अशुद्ध नही हैं पर्याय, परिणति अशुद्ध है।
पंडित धन सिंह ज्ञायक ने बताया कि जैन दर्शन आत्म दर्शन का धर्म है प्रदर्शन का नही। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति प्रदर्शन की बजाय दर्शन को अपना चिंतन बनावे। जिंतन करने से आत्म ज्ञान बढ़ता है। जबकि प्रदर्शन से बाहरी चकाचौंध क्षण भर के लिए प्रभावित करती है। जव तक चलता रहेगा, प्रदर्शन तब तक नही होगा आत्मा का दर्शन।
संस्कारो को विस्तार से बताते हुए उन्होने कहा कि जैन मंदिरो में संचालित पाठ शालाओं में बालक बालिकाओं में संस्कारो का बीजारोपण होता है। प्राप्त संस्कार जीवन के अंतिम क्षण तक साथ बने रहते हैं । धर्म के संस्कार संपत्ति बालक को सौंप दी है तो इस भव के साथ अगले भव में भी कारगर होगी। पाठशाला में धार्मिक संस्कार मिलते है। आत्म तत्व ज्ञान के स्वरुप को बताया जाता हैं। अलौकिक ज्ञान पाठशाला से ही मिलता हैं।



