धार्मिकमध्य प्रदेश

किसानों के लिए खास होता है होली पर्व, होलिका दहन में लगाते हैं नई फसलों का भोग

होली त्योहार में आज भी गुलारियों का प्रचलन
सिलवानी। आदिवासी वानांचल में फागुन के महीने में गांव की चैपालों में फाग की अनोखी महफिलें जमती हैं। जिनमें रंगों की बौछार के बीच गुलाल-अबीर से सने चेहरों वाले फगुआरों के होली गीत जब गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है कि श्रृंगार रस की बारिष हो रही है। फाग के बोल सुनकर बच्चे, जवान व बूढों के साथ महिलाएं भी झूम उठती हैं। सुबह हो या षाम गांव की चैपालों में सजने वाली फाग की महफिलों में ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार के साथ उड़ते हुए अबीर गुलाल में रंगे फगुहारे और श्रोता मस्ती में चूर होकर नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
इसलिए मनाते है फाग
माना जाता है कि यह त्योहार पर अनाज पकाकर साल भर घर में समृद्धि और संपन्नता की कामना की जाती है। बताते हैं कि होलिका के दहन पर भगवान के भक्तों ने वही राख एक दूसरे पर डालकर खुषियां मनाई थी। इसलिए होली की षुरूआत हुई। बाद में राख का स्थान रंग ने ले लिया।
घर-घर बनती हैं गोबर की गुलारियां
बुर्जुग बताते हैं कि फागुन मास में होली के पहले ग्रामीण महिलाएं घर-घर गोबर से छोटे कंडे जिन्हें गुलरिया नाम से जाना जाता है, उसे बनाकर रखती हैं। ऐसा सनातन काल से चला आ रहा है। इसके फायदे भी हैं, सूखे गोबर में वेक्टेरिया से लड़ने की क्षमता होती है। इसे घर में जलाने से विभिन्न कीटों का नाष हो जाता है। बुर्जुगों ने बताते है कि होली में जलाए गुलरिया की आग लोग अपने-अपने घर ले जाते हैं जिस आग को घर के चूल्हे में जलाकर विधि विधान से नई आग का स्वागत कर पूजा होती है। पहले इस आग को लोग वर्ष भर जिंदा रखते थे। फाग मौज मस्ती के साथ एक दूसरे के गिले षिकबे दूर कर मिलने का त्योहार है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कीचड़ और गोबर से फाग होती है। हालांकि अब रंग का अधिक उपयोग होने लगा है। फाग की षुरूआत भगवान श्रीकृष्ण के समय से हुई थी। वहीं इस पर्व को किसानों के लिए खास माना जाता है। क्योंकि होली दहन पर लोग नई फसल का भोग लगाते हैं और इसके बाद खेतों में कटाई का कार्य जोर पकड़ता है। वहीं होलिका दहन के साथ ही तापमान में बढ़ोत्तरी हो जाती है।

Related Articles

Back to top button