आस्था, राजनीति और आपदाओं की दास्तान

जुलाई माह का लेखा जोखा
हरीश मिश्र, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
जुलाई माह का आग़ाज़ हाथरस में सत्संग त्रासदी से हुआ और अंजाम वायनाड में आसमानी आफ़त से।
भोले बाबा उर्फ नारायण सरकार के चरणों की रज लेने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ते देखा…ढह गया विश्वास… चरणों में जो गिरे…ख्वाब सब बिखर गए… अधूरी कहानी दफन हो गईं… अंधविश्वास की चौखट पर…आस्था को दम तोड़ते और सरकार को अधिकारियों की लापरवाही पर कफ़न ढांकते देखा।
सरकारें आतीं हैं, कुछ नहीं कर पाती तो शहरों, स्टेशनों, स्टेडियमों , कानूनों का नाम जरूर बदलती हैं। ०.३ मोदी सरकार को तीन आपराधिक कानूनों का नाम बदलते देखा। *ये भी एक सकारात्मक रोजगार है, सोशल मीडिया पर बेरोजगारों को बहस का मुद्दा मिल जाता है । हर हाथ को काम मिल जाता है और कोई निट्ठल्ला नहीं रहता।*
संसद के इस सत्र में ज़ेर-ए-बहस होते और उच्च पदों पर बैठे माननीयों को असत्य वचन बोलते देखा।
लोकसभा चुनाव २०२४ में रोटी के मुद्दे पर नेता भूखी अंतड़ियों को गारंटी देते रहे जब वे जीत जाएंगे तो एक नई सुबह होगी। जिसमें हर भूखे की थाली में रोटी और दाल होगी। भूखे पेट को उस सुबह का इंतजार है। रात के अंधेरे में चमगादड़ उल्टी लटक रहीं हैं और सुबह पंछी चहक रहे हैं। बाबूलाल-रामानाराण के तिथि पत्र में तिथि बदलती रहीं हैं। लेकिन मतदाताओं के हिस्से में
हिंदी कवि, गजलकार दुष्यंत कुमार की गज़ल ही आई और अश्वासन मिला सब्र कर-
*भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ !*
*आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दा!*
*मोहब्बत की दुकान के संस्थापक! नेता प्रतिपक्ष !* को रोटी की जगह हिंदू समाज की सहजता , सरलता पर निशाना लगाते
और *हिंदू समाज को हिंसक कह कर,अपमानित करते देखा।*
लोकतंत्र में चुने गए शासक अधर्म का मार्ग नहीं छोड़ते, क्योंकि उन्होंने असत्य और प्रवचन को राजनीति का धर्म बना रखा है ।
परम्परा अनुसार बजट से पहले निर्मल हलवा बांटते और हलवा बनाने वालों में *वंदनीय आत्मा ! को जाति ढूंढते देखा। अनुराग ठाकुर की जीभ ने भी सदन में खूब उत्पात मचाया ।* वाक्पटुता से माननीय ! ओम बिड़ला जी को ओम् ध्वनि का उच्चारण कर पक्षपात न करने का सत् -पथ दिखाया। संजय सिंह को केजरीवाल का दर्द और इमरान
प्रतापगढ़ी को मज़हबी नज़्म सुनाते देखा। नीति आयोग की बैठक में ममता को माईक बंद का आरोप लगाते देखा। सरकार ने स्पष्टीकरण दिया ममता जी का माईक बंद नहीं किया गया, पल भर में जो कुछ घटित हुआ, बंगाल का जादू था।
मोहन सरकार को बजट में चार लाख नौकरियों का वादा और नर्सिंग घोटाले में विश्वास पर आरोप लगाते देखा। *जंगल कटवाने वाले कुछ चौकीदारों को भी एक पेड़ मां के नाम लगाते देखा।* रीवा में दो महिलाओं को जिंदा दफनाते देखा। *छोटी-सी बात पर राम को निवास बदलते देखा…* सत्ता के लिए रिश्तेदार बदलते देखा….
यकीन सा उठ चला हर नेता से , अक्सर नेताओं को किरदार बदलते देखा।
कांग्रेस विधायक राम निवास रावत को भाजपा के योग्य विधायकों का हक छीनते अर्थात मंत्री पद की शपथ लेते देखा । पद छिनने पर मंत्री नागर सिंह चौहान को छप्पन इंच छाती पीटते और संगठन की लताड़ पर खिसियाते हुए आनंद लेते देखा।
*कठुआ, डोडा में सेना के जवानों को शहीद होते और सर्जिकल स्ट्राइक सरकार ०.३ को सब्र करते देखा।* अनंत राधिका को परिणय सूत्र में बंधते और लाखों बच्चों को कुपोषण से ग्रसित देखा। भोजशाला में पाषाण चीरकर सच निकला, राजा भोज द्वारा बनवाया मंदिर निकलते देखा। केदारनाथ से सोना गायब की खबर देखी और
धार्मिक नगरी ब्रद्रीनाथ में भाजपा को हारते देखा। *मनु को पेरिस में दिव्य घोष करते देखा।*
सुप्रीम कोर्ट ने माना नीट परीक्षा में बड़े स्तर पर धांधली होने के पुख्ता सबूत नहीं मिले। दूसरी तरफ छात्रों को आरोप लगाते देखा… *नीट के मीट की बोटी-बोटी नौकरशाहों और नेताओं में बंटी है।* दिल्ली में कोचिंग में तीन छात्रों की मौत देखी। तीन *मौत के बाद सरकार का दृष्टिकोण बदलते देखा।* दृष्टि कोचिंग पर ताले डलते देखा।
फिर मौत आधी-रात में दबे पांव चोरी-छुपे केरल पहुंची। भूस्खलन का सैलाब आया ,अपनों को ज़िंदा दफन होते देखा।
कुल मिलाकर जुलाई में बहुत हुई मंहगाई… बहुत रुलाई…कम मुस्कराई…



