धार्मिक

17 जुलाई 2024 : कब है देवशयनी एकादशी? इस दिन से शुरू होगा चातुर्मास, नहीं होंगे शुभ काम, 4 महीने सोएंगे भगवान

Astologar Gopi Ram : आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🔮 17 जुलाई 2024 : कब है देवशयनी एकादशी? इस दिन से शुरू होगा चातुर्मास, नहीं होंगे शुभ काम, 4 महीने सोएंगे भगवान
🔘 HIGHLIGHTS
🔹 हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में देवशयनी एकादशी मनाई जाती है।
🔹 देवशयनी एकादशी तिथि पर सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है।
🔹 देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं।
🔹 सबसे पहले राजा मांधाता ने रखा था देवशयनी एकादशी व्रत।
🔹 देवशयनी एकादशी की कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है. इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं. देवशयनी एकादशी के दिन से ही चातुर्मास का प्रारंभ होता है. चातुर्मास में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है. इसमें मुंडन, शादी, सगाई, गृह प्रवेश आदि जैसे मांगलिक कार्य पूर्णतया वर्जित बताए गए हैं. देवशयनी एकादशी का अर्थ है- वह एकादशी, जिस दिन देव शयन करते हैं. आइए जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से कि देवशयनी एकादशी कब है? चातुर्मास कब से शुरू हो रहा है?
💁🏻‍♀️ किस दिन है देवशयनी एकादशी 2024?
आचार्य श्री गोपी राम के अनुसार, देवशयनी एकादशी के लिए महत्वपूर्ण आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि इस साल 16 जुलाई मंगलवार को रात 08 बजकर 33 मिनट से शुरू होगी. यह तिथि 17 जुलाई बुधवार को रात 09 बजकर 02 मिनट पर खत्म होगी. ऐसे में उदयातिथि के आधार पर इस साल देवशयनी एकादशी 17 जुलाई को है.
💧 देवशयनी एकादशी 2024 मुहूर्त और पारण
देवशयनी एकादशी व्रत के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 05:34 ए एम से ही बना है. उसके बाद भी आप कभी भी पूजा कर सकते हैं. जो लोग 17 जुलाई को देवशयनी एकादशी का व्रत रखेंगे, वे पारण 18 जुलाई को 05:35 ए एम से 08:20 ए एम के बीच कभी भी कर सकते हैं.
🙇🏻 पूजा विधि
👉🏽 स्नान और संकल्प- व्रत करने वाले व्यक्ति को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद, भगवान विष्णु की पूजा का संकल्प लें।
👉🏽 मंदिर की सजावट- घर के मंदिर को स्वच्छ करें और भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को गंगाजल से स्नान कराएं। उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं और सुंदर फूलों से सजाएं।
👉🏽 पूजा सामग्री- पूजा के लिए चंदन, तुलसी पत्र, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पंचामृत, फल, और पीले फूलों का उपयोग करें।
👉🏽 पूजा विधान- भगवान विष्णु की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्वलित करें और धूप, दीप, चंदन, पुष्प आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु को पंचामृत और फल का नैवेद्य अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम या विष्णु स्तोत्र का पाठ करें।
🧾 देवशयनी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ

चातुर्मास का प्रारंभ देवशयनी एकादशी के दिन से होता है. चातुर्मास आषाढ़ माह के शुक्ल एकादशी तिथि से प्रारंभ होकर कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलता है. कार्तिक शुक्ल एकादशी को चातुर्मास का समापन होता है. उस दिन देवउठनी एकादशी होती है. चातुर्मास में आषाढ़, सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह आते हैं, लेकिन तिथियों से तिथियों की गणना करने पर 4 माह होता है.
🛌🏻 चातुर्मास में 4 महीने तक सोएंगे भगवान
चातुर्मास के प्रारंभ होते ही भगवान श्रीहरि विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं. वे सृष्टि के संचालन का कार्य भगवान शिव को सौंप देते हैं. माना जाता है कि इस दिन से 4 माह के लिए देव शयन करने चले जाते हैं.
🔱 भगवान शिव संभालते हैं कार्यभार

सृष्टि के संचालक और पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु हैं। ऐसे में देवशयनी एकादशी के बाद भगवान पूरे चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को भगवान का भी शयनकाल कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु के शयनकाल में जाने के बाद सृष्टि के संचालन का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं, इसलिए चातुर्मास के चार महीनों में विशेषरूप से शिवजी की उपासना फलदाई है।
🤷🏻 देवशयनी एकादशी महत्व
देवशयनी एकादशी व्रत करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति सभी सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को जाता है।
🗣️ देवशयनी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी ने नारदजी को बताया था कि सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा का शासन था। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी रहती थी, लेकिन नियति को पलटने में देर नहीं लगती है। अचानक, तीन वर्षों तक वर्षा नहीं होने के कारण राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया।
यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि धार्मिक क्रियाएं कोई भी कार्य नहीं हो पा रहे थे। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। राजा मांधाता इस स्थिति से पहले ही परेशान थे और सोचते थे कि न जाने किस पाप के कारण यह आपदा उन पर आई है।
👵🏼 अंगिरा ऋषि ने बताया कारण_
राजा मांधाता अपनी सेना सहित वन की ओर प्रस्थान कर, ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे। ऋषिवर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनके आने का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर कहा, महात्मन्, मैं धर्म का पालन पूरी ईमानदारी से करता हूं, लेकिन इसके बावजूद भी पिछले तीन वर्षों से मेरे राज्य में बारिश नहीं हुई है और राज्य में अकाल पड़ा हुआ है।
महर्षि अंगिरा ने कहा कि हे राजन्! सतयुग में छोटे से पाप का भी भयंकर दण्ड मिलता है। आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है, जो इस युग में अनुचित माना गया है। इसी कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं होती। जब तक वह शूद्र तपस्वी जीवित रहेगा, अकाल समाप्त नहीं होगा।
राजा मांधाता ने कहा, “हे भगवान! मेरा मन किसी निर्दोष व्यक्ति को मारने को तैयार नहीं है। कृपया कोई अन्य उपाय बताएं।” महर्षि अंगिरा उन्हें आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में अवश्य वर्षा होने की बात कही। राजा ने राजधानी लौटकर विधि-विधान से पद्मा एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से मूसलाधार वर्षा हुई और राज्य धन-धान्य से भर गया।

Related Articles

Back to top button