समोशरण श्री रत्नाकर 72 परिवारों के द्वारा समूह संविधान शुरू
ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । नसिया जी में सिद्धचक्र मंडल विधान के दूसरे दिन शुक्रवार को 72 मंदिरों का निर्माण कर जैन परंपरा में भवंतु के रूप में तीर्थंकर की मान्यता है आत्म साधना करते हुए मुनि बुद्धि ज्ञान को प्राप्त करते हैं तब उसे के गुल्लक ज्ञान कहा जाता है इस ज्ञान के साथ अरिहंत परमात्मा जिस सभा में विराजमान होते हैं उसे समोसारण कहते हैं इसी समोसारण में भगवान का दिव्य रूप समुचित प्राणी जगत में होता है इस धर्म सभा में देव दानव मानव यहां तक पशु-पक्षी भी भगवान की वाणी को सुनते हैं अपने परिणामों में समता भाव लाते हैं आपस के विरोध राग द्वेश भेदभाव को भूलकर मैत्री प्रेम भाव का भाव रखते हैं इस प्रकार का समूह शरण प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के समय लगा 24 वे तीर्थंकर महावीर स्वामी के समय लगा उसी सिद्धांत और परंपरा को ध्यान में रखते हुए पूजन पद्धति में खुशी समोसारण की भावना रखी जाती है ।
धर्म नगरी बेगमगंज में विराजमान तपस्वी मुनि संघ के चतुर्मास समापन पर जैन समाज में विश्व शांति की कामना और सभी के सुख समृद्धि की भावना से नगर वासियों के धन धान्य व खुशहाली के अनुष्ठान किया गया है। जिसमें 72 परिवारों के द्वारा समूह शरण श्री रत्नाकर जी की पूजा से शुरू किया गया है। विशेष बात यह है कि मुनि संघ स्वयं इस पूजा यज्ञ में उपस्थित होकर देश की अखंडता और एकता के लिए श्रीजी की शांति धारा में मंत्रों का वाचन करते हैं। उपस्थित सभी श्रद्धालुओं के लिए धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देते हैं।
इस अवसर पर सुबह 7 बजे शिविर में शामिल शिवरार्थियों एवं श्रद्धालुओं द्वारा श्रीजी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई । मुनिश्री ने उत्तम मार्दव धर्म के अवसर पर कहा कि आज इ उत्तम मार्दव धर्म है । उत्तम धर्म के अवसर पर बोलते हुए , उन्होंने कहा कि उत्तम का अर्थ होता है ख्याति , पूजा , लाभ आदि से रहित जिन्होंने अपने मन को मार दिया है , जिन्होंने अपने मान का मर्दन कर दिया है । वहीं उत्तम मार्दव धर्म का अधिकारी होता है । मुनिश्री ने कहा कि मान मनुष्य को झुकने नहीं देता अनादि काल से इस मान की संगति से हमारा पतन होता आ रहा है । उन्होंने कहा जिसके वचनों में कोमलता होती है जो कठोर वचन नहीं बोलता किसी को पीड़ा देने वाले वचन नहीं बोलता वही मार्दव धर्म का अधिकारी होता है । अपने कुल , जाति , धर्म , बुद्धि , तप , शास्त्र ज्ञान , चरित्र , धन और शक्ति से युक्त होकर भी इन सब के विषय में समता भाव रखते हुए किंचित मात्र घमंड या मान नहीं करना ही उत्तम मार्दव धर्म है ।




