धार्मिक

बेगमगंज में भारी वर्षा के बीच श्रीगणेश प्रतिमाओं का हुआ विसर्जन

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । अंनत चतुर्दशी पर नगर में 10 दिन से करीब तीन दर्जन सार्वजनिक स्थानों एवं घर -घर में विराजमान विध्न विनाशक की प्रतिमाओं का चल समारोह हिंदू उत्सव समिति के तत्वाधान में दशहरा मैदान से शुरू किया गया जो नया बस स्टैंड, पुराना बस स्टैंड, गांधी बाजार, कबीट चौराहा, किला, माला फाटक, जामा मस्जिद रोड, पक्का फाटक, गणेश मंदिर रोड से होता हुआ सागर रोड पर पहुंचा जगह-जगह चल समारोह का लोगों ने पुष्प वर्षा कर एवं समिति सदस्यों को फूलमाला पहनकर स्वागत किया।
देर शाम सेमरी नदी के हफसिली घाट बीना नदी बरखेड़ी घाट पर बहुत तेज बरसते पानी में सभी प्रतिमाओं का विसर्जन एसडीएम सौरभ मिश्रा, तहसीलदार एसआर देशमुख, एसडीओपी आलोक श्रीवास्तव, थानाप्रभारी संतोष सिंह, सीएमओ केके शर्मा सहित पुलिस बल की मौजूदगी में किया गया। घाटों पर गोताखोर, आपदा मित्र, फॉरेस्ट जवान, नगर सुरक्षा समिति सदस्य, चौकीदार, मोबाइल टीम भी तैनात रही।
आज पूरे मौसम की सबसे तेज वर्षा हुई। लोगों का कहना है कि बहुत वर्षों के बाद इतनी तीव्र गति से वर्षा होते देखी है। एक घण्टे में चारों ओर पानी -पानी हो गया और बिजली व्यवस्था ठप्प हो गई । तेज बरसते पानी में भी भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ बल्कि ओर अधिक मस्ती में नाचते -जयकारे लगाते चलने लगे। सभी समितियों के कर्ताधर्ताओं द्वारा अचानक तेज वर्षा आने पर आनन फानन में पॉलीथिन से प्रतिमाओं को ढांपकर सुरक्षित किया गया।
दशहरा मैदान पर नगर की सभी झांकियां सुबह से ही एकत्रित होने लगी थी। दोपहर करीब तीन बजे हिंदू उत्सव समिति अध्यक्ष संतोष राय, महामंत्री महेश नेमा, एवं अन्य पदाधिकारियों तथा संरक्षकों मलखानसिंह जाट, राजेंद्र सिंह तोमर, संतोष जैन कंडया, सुरेश ताम्रकार, कमल सिंह साहू, बसंत शर्मा, पंडित रवि रावत, संजय राय, संजय सोलंकी, अजयसिंह जाट, बबलू यादव, विजय पहलवान, नगर पालिका अध्यक्ष संदीप लोधी, उपाध्यक्ष सुदर्शन घोषी,
जुगलकिशोर देवलिया, राजेश यादव इत्यादि के मार्गदर्शन में श्रीगणेश जी का चल समारोह प्रारंभ हुआ।
चल समारोह में सभी प्रतिमाएं कतारबद्ध निकली। आगे -आगे अखाड़ों के लड़के करतब दिखाते हुए चल रहे थे, वही डीजे एवं बैंडबाजों की धुन पर युवाओं की टोलियां पीछे -पीछे नृत्य करते ” गणपति बप्पा मोरिया, अगले वर्ष तू जल्दी आ ‘” के जयकारे लगाते हुए चल रहीं थीं। एक- एक करके सभी प्रतिमाएं क्रमबद्ध नदियों के घाट पर पहुंची। यहां पर क्रम अनुसार उनका विसर्जन किया गया।

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