पारिस्थितिकी तंत्र बहाली पर महिला कृषकों का प्रशिक्षण एवं क्षमतावर्धन कार्यक्रम संपन्न
ब्यूरो चीफ : भगवत सिंह लोधी
तेजगढ़ । जनपद पंचायत तेंदूखेड़ा अंतर्गत आने वाले ग्राम पतलोनी में स्मॉल ग्रांट प्रोग्राम (SGP) के 7 वें परिचालन चरण के अंतर्गत ऊर्जा और संसाधन संस्थान TERI ( THE ENERGY RESOURCES- NSTITUTEके सहयोग से नेशनल सेंटर फॉर ह्यूमन सेटलमेंटस एंड एनवायरमेंट (एन.सी.एच.एस.ई) भोपाल द्वारा दमोह जिले की तेंदूखेड़ा तहसील के देवरी लीलाधर और पतलोनी गांव में “जलवायु अनुकूल पद्धतियों को अपनाकर अवक्रमित/कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और उत्पादकता में सुधार हेतु” परियोजना क्रियान्वित की जा रही है । इस परियोजना का उद्देश्य ग्रामीण समुदाय को ऐसी प्रौद्योगिकियों और पद्धतियों को अपनाने के लिए शिक्षित और प्रोत्साहित करना है, जो प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप कृषि पद्धतियों, पारिस्थितिकी सेवाओं में सुधार के साथ-साथ पर्यावरण के और अधिक क्षरण को रोकने और उनकी आजीविका को बढ़ाने में सहायक हों। इसी कड़ी में 25 जनवरी 2025 को विकासखण्ड तेंदुखेडा के चयनित गांव पतलोनी में परियोजना क्षेत्र के 50 से अधिक महिलाओं कृषकों का पारिस्थितिकी तंत्र बहाली पर प्रशिक्षण एवं क्षमतावर्धन कार्यक्रम किया गया कार्यक्रम की शुरुवात में एन.सी.एच.एस.ई. संस्था से कृषि विशेषज्ञ आशीष पाटीदार ने चयनित गांवों में परियोजना गतिविधियों साथ ही स्थानीय संसाधनों का उपयोग, जैव विविधता संरक्षण एवं कृषि, पशुपालन और बागवानी को एकीकृत कर के स्थिर आजीविका का निर्माण किस प्रकार किया जा सकता है, के बारे में महिला कृषकों जानकारी दी गई | तत्पश्चात उद्यानिकी विभाग अधिकारी प्रेमलाल अहिरवार ने बताया कि कृषि – वानिकी एक भूमि उपयोग प्रणाली है, जो वृक्षारोपण, फसल उत्पादन और पशुपालन को इस प्रकार एकीकृत करती है कि उत्पादकता, लाभप्रदता और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता बढ़े उन्होंने महिला कृषकों को यह भी बताया व आग्रह किया कि सहजन (मुनगा), अमरूद आम, सीताफल, आंवला, जल्द फल देने वाली प्रजातियों शाक सब्जी आदि को किचिन गार्डन में लगाने के लिए कहा क्योंकि यह फल पौधे रसायन मुक्त व पोषक तत्वों से भरपूर होते है l घर का पानी जो उपयोग के बाद व्यर्थ बहकर जाता है उसका उचित प्रबंधन करउस पानी का उपयोग किचिन गार्डन में हमेशा कर सकते है, जैविक खाद केचुआ खाद का घर पर ही उत्पादन किस प्रकार किया जाए के बारे में बताया एवं यह भी बताया कि फलदार पौधे लगाने के लिए गड्डे को 2×2×2 आकार का हो, पौधे से पौधे की दूरी 20 फीट हो l उन्होंने वर्तमान में चल रही फल विस्तार योजना के बारे में बताया और यह भी कहा की समय समय पर उद्यानिकी विभाग की वेबसाइट विजिट कर MPFSTS ऑनलाइन पंजीकरण कर एवं विभाग से संपर्क कर योजनाओं का लाभ ले सकते है l
पशुपालन विभाग के अधिकारी डॉ. हरिकांत बिलवार ने बताया कि पोषण, आजीविका और भूमि की उर्वरता बढ़ाने में पशुपालन का अहम योगदान होता है साथ ही स्थानीय जलवायु और भूभाग के अनुसार पशुओं की प्रजातियों का चयन करना चाहिए उन्नत पशु लाकर, पशुओं को नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान कराकर, उच्च दूध उत्पादन पशु से क्रॉस करा कर विभिन्न प्रकार की बीमारियों जैसे खुरपका मुहपका, घरूड़ा (गले में सूजन) आदि का समय से पशुओं का टीकाकरण कम किया जा सकता है l पशु शाला का उचित प्रबंधन जैसे रोशनी, हवा, प्रकाश, आदि होने पर पशु में बीमारियां होने का खतरा कम होता है l पशु बाड़े में मल मूत्र निकलने का उचित स्थान हो | महिलाएं गोमूत्र व गाय के गोबर से खेती में प्रयोग होने वाली जैव कीटनाशी दवाइयां, जैविक खाद, प्राक्रतिक दवाईयां जैसे जीवामृत, बीजामृत आदि बना सकते है जिससे आर्थिक सशक्तिकरण साथ ही साथ महिलाएं कृषि-वानिकी के माध्यम से फल,चारा, और ईंधन लकड़ी का उत्पादन कर अपनी आजीविका सुदृढ़ कर सकती है इन्होंने यह भी कहा की समय पर पशु चिकित्सक का संपर्क नंबर न होने की दशा में पशु हेल्प लाइन नंबर 1962 पर कॉल कर पशु चिकित्सा वैन बुलवाकर पशुओं का इलाज करा सकते हैं।



