Today Panchang आज का पंचांग बुधवार, 26 फरवरी 2025

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
जय श्री हरि
🧾 आज का पंचांग 🧾
बुधवार 26 फ़रवरी 2025
आप सभी सनातनियों को “श्रीवैदनाथ जयन्ती एवं महाशिवरात्रि के पावन पर्व व्रत” की हार्दिक शुभकामनाएं।।
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।
☄️ दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है।
बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है।
बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2024 विक्रम संवत : 2081 पिंगल संवत्सर विक्रम : 1946 क्रोधी
🌐 संवत्सर नाम पिंगल
🔯 शक सम्वत : 1946 (पिंगल संवत्सर)
☸️ काली सम्वत् 5125
🕉️ संवत्सर (उत्तर) पिंगल
☣️ आयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – सौर बसंत ऋतु
🌤️ मास – फाल्गुन मास
🌘 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📆 तिथि – बुधवार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि 11:08 AM तक उपरांत चतुर्दशी
✒️ तिथि स्वामी – त्रियोदशी तिथि के स्वामी कामदेव जी है त्रयोदशी तिथि के स्वामी कामदेव जी हैं। कामदेव प्रेम के देवता माने जाते है ।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र श्रवण 05:23 PM तक उपरांत धनिष्ठा
🪐 नक्षत्र स्वामी – श्रवण नक्षत्र का स्वामी शनि ग्रह है। नक्षत्र का स्वामी है चंद्रमा और भगवान् विष्णु इसके स्वामी देवता हैं।
⚜️ योग – परिघ योग 02:57 AM तक, उसके बाद शिव योग
⚡ प्रथम करण : वणिज – 11:08 ए एम तक
✨ द्वितीय करण – विष्टि – 10:05 पी एम तक शकुनि
🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 11:10 से 12:35 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है ।इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:35 से 2:00 तक । राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 06:18:00
🌅 सूर्यास्तः- सायं 06:42:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:09 ए एम से 05:59 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 05:34 ए एम से 06:49 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं
✡️ विजय मुहूर्त : 02:29 पी एम से 03:15 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 06:16 पी एम से 06:42 पी एम
🏙️ सायाह्न सन्ध्या : 06:19 पी एम से 07:34 पी एम
💧 अमृत काल : 07:28 ए एम से 09:00 ए एम 06:03 ए एम, फरवरी 27 से 07:32 ए एम, फरवरी 27
🗣️ निशिता मुहूर्त : 12:09 ए एम, फरवरी 27 से 12:59 ए एम, फरवरी 27
🚓 यात्रा शकुन-हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
💁🏻 आज का उपाय-किसी बटुक को हरे केले भेंट करें।
🌳 वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – महाशिवरात्रि व्रत/पंचक प्रारंभ/ शिवपूजन (निशिथकाल उ. रात्रि 00.27 से उ. रात्रि 01.16 तक)/ स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर शहीद दिवस, अभिनेत्रा मनमोहन कृष्णा जन्म दिवस, राजनीतिज्ञ बेनेगल नरसिंह राव जन्म दिवस, राजनीतिज्ञ शंकरराव चह्वाण पुण्य तिथि, पार्श्वगायक पंकज उदास स्मृति दिवस, भारत के भूतपूर्व उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक जन्म दिवस, बांग्ला साहित्यकार लीला मजूमदार जन्म दिवस, साहित्यकार मृणाल पाण्डे जन्म दिवस, प्रसिद्ध भारतीय फ्रीस्टाइल पहलवान बजरंग पुनिया जन्म दिवस
✍🏼 तिथि विशेष:- त्रयोदशी तिथि को बैंगन त्याज्य होता है। अर्थात आज त्रयोदशी तिथि में भूलकर भी बैंगन की सब्जी या भर्ता नहीं खाना चाहिए। त्रयोदशी तिथि जयकारी अर्थात विजय दिलवाने वाली तिथि मानी जाती है। यह त्रयोदशी तिथि सर्वसिद्धिकारी अर्थात अनेकों क्षेत्रों में सिद्धियों को देनेवाली तिथि मानी जाती है। यह त्रयोदशी तिथि जया नाम से विख्यात मानी जाती है। यह त्रयोदशी तिथि शुक्ल पक्ष में शुभ और कृष्ण पक्ष में अशुभ फलदायिनी होती है।
🏘️ Vastu tips 🏚️
वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर या कार्यालय में मिट्टी का घड़ा, यानि मटका रखने के लिए सबसे उचित दिशा है– उत्तर दिशा। वास्तु के मुताबिक, पंच तत्वों- अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश में से उत्तर दिशा का संबंध जल तत्व से है। ऐसे में उत्तर दिशा में जल संबंधी चीजें रखने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार पानी से भरे मिट्टी के घड़े या मटके को रखने के लिए उत्तर दिशा को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इससे आपको उत्तर दिशा से संबंधित शुभ फलों की प्राप्ति होगी। इससे आपके ऊपर वरूण देव का आशीर्वाद बना रहता है। साथ ही आपको किसी तरह का भय नहीं सताता, यानि आपको किसी चीज़ से डर नहीं लगता है। उत्तर दिशा में जल संबंधी चीज़ें रखने से हमारे शरीर में सबसे ज्यादा लाभ हमारे कानों को मिलता है। इससे हमारी सुनने की क्षमता मजबूत रहती है।
♻️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
औषधीय गुण: इस पौधे का उपयोग खांसी, दमा, स्किन एलर्जी, बुखार और कई अन्य बीमारियों में किया जाता है। लसोड़ा के कुछ औषधीय गुण हैं, कृमिनाशक, विष नाशक, पाचक, मूत्रक व कफ नाशक।
छाल का काढ़ा ज्वर, अतिसार व गले की बीमारियों में; पत्तियों का काढ़ा ल्यूकोरिया व प्रमेह में; तथा बीजों का पेस्ट दाद, खाज आदि में लाभदायक होता है।
मर्दाना ताकत की कमजोरी, वीर्य का पतलापन, शीघ्र पतन, नपुंसकता में लसोड़ा को दूध के साथ लेते हैं।
जोड़ों में दर्द और सूजन में छाल के काढ़े में कपूर मिलाकर मालिश करने से राहत मिलती है।
गले की खराश या खांसी में लसोड़े के फल या छाल का काढ़ा पीने से काफी राहत मिलती है।
लकड़ी : लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है, तथा इमारती काम के लिए प्रयोग की जाती है। इससे बन्दूक के कुन्दे भी बनाये जाते हैं।
🍃 आरोग्य संजीवनी ☘️
गठिया की समस्या हो जाने पर पूरी लाइफस्टाइल अस्त-व्यस्त हो जाती है। अगर आप चाहते हैं कि ये समस्या आपको न हो तो आज से ही अपने आहार में इन चीजों को अनिवार्य रूप से शामिल करें।
लहसुन के सेवन से जोड़ों के दर्द में काफी आराम मिलता है. विशेषज्ञ भी मानते हैं कि प्याज और लहसुन में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो जोड़ों के दर्द में फायदेमंद होते हैं. इनके नियमित सेवन से जोड़ों के दर्द की शिकायत होने का खतरा काफी कम हो जाता है।
विटामिन – E जोड़ों के दर्द के लिए बहुत फायदेमंद होता है. खासतौर पर बादाम में पाया जाने वाला ओमेगा 3 फैटी एसिड सूजन और गठिया के लक्षणों को कम करने में मददगार होता है। बादाम के अलावा मूंगफली में भी पर्याप्त मात्रा में ओमेगा 3 फैटी एसिड पाया जाता है।
पपीते में बड़ी मात्रा में विटामिन C पाया जाता है. विटामिन C न केवल इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाता है बल्कि ये जोड़ों की सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद है।
एक गिलास पानी में एप्पल साइडर विनिगर मिलाकर पीने से जोडों के दर्द में फायदा मिलता है. इसके अलावा ब्रोकली खाने से भी गठिया में आराम मिलता है। ब्रोकली में कई ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो जोड़ों की सेहत लंबे समय तक बरकरार रखते हैं।
📚 गुरु भक्ति योग 🕯️
बहुत समय पहले भंगस्वाना नाम का एक राजा रहता था। वह न्यायप्रिय और बहुत यशस्वी था लेकिन उसके कोई पुत्र नहीं था।
एक बालक की इच्छा में उस राजा ने एक अनुष्ठान किया जिसका नाम था ‘अग्नीष्टुता’। उस हवन में केवल अग्नि भगवान का आदर हुआ था इसलिए देवराज इन्द्र काफी क्रोधित हो गए। इंद्र अपने गुस्से को निकालने के लिए एक मौका तलाशने लगे ताकि राजा भंगस्वाना से कोई गलती हो और वह उसे दण्ड दे सकें। पर भंगस्वाना इतना अच्छा राजा था की इन्द्र को कोई मौका नहीं मिल रहा था जिस कारण से इन्द्र का गुस्सा और बढ़ता जा रहा था।
एक दिन राजा शिकार पर निकला, इन्द्र ने सोचा ये सही समय है और अपने अपमान का बदला लेने का और इन्द्र ने राजा को सम्मोहित कर दिया। राजा भंगस्वाना जंगल में इधर-उधर भटकने लगा। अपनी सम्मोहित हालत में वह सब सुध खो बैठा, ना उसे दिशाएं समझ आ रही थीं और ना ही अपने सैनिक नहीं दिख रहे थे।
भूख-प्यास ने उसे और व्याकुल कर दिया था। अचानक उसे एक छोटी सी नदी दिखाई थी जो किसी जादू सी सुन्दर लग रही थी। राजा उस नदी की तरफ बढ़ा और पहले उसने अपने घोड़े को पानी पिलाया, फिर खुद पिया। जैसे ही राजा ने नदी के अन्दर प्रवेश किया और पानी पिया, उसने देखा की वह बदल रहा है। धीरे-धीरे वह एक स्त्री में बदल गया।
शर्म से बोझल वह राजा जोर-जोर से विलाप करने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था की ऐसा उसके साथ क्यों हुआ। राजा भंगस्वाना सोचने लगा, हे प्रभु ! इस अनर्थ के बाद में कैसे अपने राज्य वापस जाऊँगा ? मेरे अग्नीष्टुता अनुष्ठान से मेरे 100 पुत्र हुए हैं उन्हें मैं अब कैसे मिलूँगा, क्या कहूँगा ? मेरी रानी, महारानी जो मेरी प्रतीक्षा कर रहीं हैं, उनसे कैसे मिलूँगा ? मेरे पौरुष के साथ-साथ मेरा राज-पाट सब चला जाएगा, मेरी प्रजा का क्या होगा, इस तरह से विलाप करता राजा अपने राज्य वापस लौटा।
स्त्री के रूप में जब राजा वापस पहुँचा तो उसे देख कर सभी लोग अचंभित रह गए। राजा ने सभा बुलाई और अपनी रानियों, पुत्रों और मंत्रियों से कहा की अब मैं राज-पाट संभालने के लायक नहीं रहा हूँ, तुम सभी लोग सुख से यहाँ रहो और मैं जंगल में जाकर अपना बाकी का जीवन बिताऊँगा। ऐसा कह कर वह राजा जंगल की तरफ प्रस्थान कर गया।
वहाँ जाकर वह स्त्री रूप में एक तपस्वी के आश्रम में रहने लगी जिनसे उसने कई पुत्रों को जन्म दिया। अपने उन पुत्रों को वह अपने पुराने राज्य ले गयी और अपने पुराने बच्चों से बोली, तुम मेरे पुत्र हो जब में एक पुरुष था, ये मेरे पुत्र हैं जब में एक स्त्री हूँ। मेरे राज्य को मिल कर, भाइयों की तरह संभालो। सभी भाई मिलकर रहने लगे।
सब को सुख से जीवन व्यतीत करता देख, देवराज इन्द्र और अधिक क्रोधित हो गए और उनमें बदले की भावना फिर जागने लगी। इन्द्र सोचने लगा कि ऐसा लगता है की राजा को स्त्री में बदल कर मैने उसके साथ बुरे की जगह अच्छा कर दिया है।
ऐसा सोच कर इन्द्र ने एक ब्राह्मण का रूप धारा और पहुँच गया राजा भंगस्वाना के राज्य में। वहाँ जाकर उसने सभी राजकुमारों के कान भरने शुरू कर दिए। इंद्र के भड़काने की वजह से सभी भाई आपस में लड़ पड़े और एक दूसरे को मार डाला।
जैसे ही भंगस्वाना को इस बात का पता चला वह शोकाकुल हो गया। ब्राह्मण के रूप में इन्द्र राजा के पास पहुँचा और पूछा की वह क्यों रो रही है। भंगस्वाना ने रोते-रोते पूरी घटना इन्द्र को बताई तो इन्द्र ने अपना असली रूप दिखा कर राजा को उसकी गलती के बारे में बताया।
इंद्र ने कहा, “क्योंकि तुमने सिर्फ अग्नि को पूजा और मेरा अनादर किया इसलिए मैने तुम्हारे साथ यह खेल रचा।” यह सुनते ही भंगस्वाना इन्द्र के पैरों में गिर गया और अपने अनजाने में किया अपराध के लिए क्षमा मांगी। राजा की ऐसी दयनीय दशा देख कर इन्द्र को दया आ गई। इन्द्र ने राजा को माफ करते हुए अपने पुत्रों को जीवित करवाने का वरदान दिया।
इंद्र बोले, “हे स्त्री रूपी राजन, अपने बच्चों में से किन्ही एक को जीवित कर लो।” भंगस्वाना ने इन्द्र से कहा अगर ऐसी ही बात है तो मेरे उन पुत्रों को जीवित कर दो जिन्हे मैने स्त्री की तरह पैदा किया है। हैरान होते हुए इन्द्र ने इसका कारण पूछा तो राजा ने जवाब दिया, “हे इन्द्र ! एक स्त्री का प्रेम, एक पुरुष के प्रेम से बहुत अधिक होता है इसीलिए मैं अपनी कोख से जन्मे बालकों का जीवन-दान माँगती हूँ।”
उसके बाद इन्द्र ने राजा को दुबारा पुरुष रूप देने की बात की। इन्द्र बोले, “तुमसे खुश होकर हे भंगस्वाना मैं तुम्हे वापस पुरुष बनाना चाहता हूँ।” पर राजा ने साफ मना कर दिया। स्त्री रुपी भंगस्वाना बोला, “हे देवराज इन्द्र ! मैं स्त्री रूप में ही खुश हूँ और स्त्री ही रहना चाहता हूँ।”
यह सुनकर इन्द्र उत्सुक हो गए और पूछ बैठे की ऐसा क्यों राजन, क्या तुम वापस पुरुष बनकर अपना राज-पाट नहीं संभालना चाहते ?” भंगस्वाना ने कहा देव, स्त्री रूप में मैने जिस सन्तुष्टि का अनुभव किया वह पुरुष रूप में कभी संभव नहीं है…
※══❖═══▩ஜ ۩۞۩ ஜ▩═══❖══※
⚜️ त्रयोदशी तिथि के देवता मदन (कामदेव) हैं। शास्त्रानुसार भगवान कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र हैं भगवान कामदेव। कामदेव प्रेम और आकर्षण के देवता माने जाते हैं। जिन पुरुषों अथवा स्त्रियों में काम जागृत नहीं होता अथवा अपने जीवन साथी के प्रति आकर्षण कम हो गया है, उन्हें आज के दिन भगवान कामदेव का उनकी पत्नी रति के साथ पूजन करके उनके मन्त्र का जप करना चाहिये। कामदेव का मन्त्र – ॐ रतिप्रियायै नम:। अथवा – ॐ कामदेवाय विद्महे रतिप्रियायै धीमहि। तन्नो अनंग: प्रचोदयात्।
आज की त्रयोदशी तिथि में सपत्निक कामदेव की मिट्टी कि प्रतिमा बनाकर सायंकाल में पूजा करने के बाद उपरोक्त मन्त्र का जप आपका वर्षों का खोया हुआ प्रेम वापस दिला सकता है। आपके चेहरे की खोयी हुई कान्ति अथवा आपका आकर्षण आपको पुनः प्राप्त हो सकता है इस उपाय से। जो युवक-युवती अपने प्रेम विवाह को सफल बनाना चाहते हैं उन्हें इस उपाय को करना चाहिये। जिन दम्पत्तियों में सदैव झगडा होते रहता है उन्हें अवश्य आज इस उपाय को करना चाहिये।

