धार्मिक

Today Panchang आज का पंचांग शुक्रवार, 08 अगस्त 2025

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
शुक्रवार 08 अगस्त 2025
08 अगस्त 2025 दिन शुक्रवार को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष कि चतुर्दशी तिथि है। आज ही व्रत की पूर्णिमा भी है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष कि चतुर्दशी के अवसर पर भगवान श्री हरि नारायण के एक दिव्यस्वरूप का उद्भव हुआ था। जिससे हयग्रीव अवतार के नाम से संबोधित किया जाता है। आज कांसी के भदैनी स्थिति भगवान के इस मन्दिर में आज लोगों का आना लगा ही रहता है। आपको कोई आज मंदिर जाकर भगवान का दर्शन और पूजन करना चाहिए। आज रात्रिकाल में सर्पबलि (अर्थात सांपों के लिए भोजन अथवा दूध इत्यादि के दान को सर्पबलि कहा जाता है) का विधान है। आज प्रदोषकाल में झूलन यात्रा का समापन हो जाएगा। आज ही प्रदोषकाल में ही नारोली पूर्णिमा भी है। आज रवियोग एवं स्वार्थसिद्धि योग भी है। आप सभी सनातनियों को “हयग्रीव जयन्ती” की हार्दिक शुभकामनाएं एवं अनन्तानंत बधाईयां।।
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥
🌌 दिन (वार) – शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख से भगवान विष्णु पर जल चढ़ाकर उन्हें पीले चन्दन अथवा केसर का तिलक करें। इस उपाय में मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं।
शुक्रवार के दिन नियम पूर्वक धन लाभ के लिए लक्ष्मी माँ को अत्यंत प्रिय “श्री सूक्त”, “महालक्ष्मी अष्टकम” एवं समस्त संकटो को दूर करने के लिए “माँ दुर्गा के 32 चमत्कारी नमो का पाठ” अवश्य ही करें ।
शुक्रवार के दिन माँ लक्ष्मी को हलवे या खीर का भोग लगाना चाहिए ।
शुक्रवार के दिन शुक्र ग्रह की आराधना करने से जीवन में समस्त सुख, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है बड़ा भवन, विदेश यात्रा के योग बनते है।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
👸🏻 शिवराज शक 352
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
☂️ ऋतु – सौर वर्षा ऋतु
⛈️ मास – श्रावण मास
🌔 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📆 तिथि – शुक्रवार श्रावण माह के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि 02:12 PM तक उपरांत पूर्णिमा
🖍️ तिथि स्वामी :- चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ जी है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है । चतुर्दशी को चौदस भी कहते हैं। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र उत्तराषाढ़ा 02:28 PM तक उपरांत श्रवण
🪐 नक्षत्र स्वामी – उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता विश्वेदेव हैं।
⚜️ योग – आयुष्मान योग 04:08 AM तक, उसके बाद सौभाग्य योग
प्रथम करण : वणिज – 02:12 पी एम तक
द्वितीय करण – विष्टि – 01:52 ए एम, अगस्त 09 तक बव
🔥 गुलिक काल : – शुक्रवार को शुभ गुलिक प्रात: 7:30 से 9:00 तक ।
⚜️ दिशाशूल – शुक्रवार को पश्चिम दिशा का दिकशूल होता है।यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से दही में चीनी या मिश्री डालकर उसे खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल -दिन – 11:13 से 12:35 तक राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 05:26:00
🌅 सूर्यास्तः- सायं 06:32:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 04:21 ए एम से 05:04 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 04:43 ए एम से 05:46 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : 12:00 पी एम से 12:53 पी एम
🔯 विजय मुहूर्त : 02:40 पी एम से 03:33 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 07:07 पी एम से 07:28 पी एम
🌌 सायाह्न सन्ध्या : 07:07 पी एम से 08:11 पी एम
💧 अमृत काल : 07:57 ए एम से 09:35 ए एम 04:01 ए एम, अगस्त 09 से 05:37 ए एम, अगस्त 09
🗣️ निशिता मुहूर्त : 12:05 ए एम, अगस्त 09 से 12:48 ए एम, अगस्त 09
सर्वार्थ सिद्धि योग : 02:28 पी एम से 05:47 ए एम, अगस्त 09
❄️ रवि योग : 05:46 ए एम से 02:28 पी एम
🚓 यात्रा शकुन-शुक्रवार को मीठा दही खाकर यात्रा पर निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:।
💁🏻 आज का उपाय-लक्ष्मी मंदिर में मखाने की खीर अर्पित करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-गूलर के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – भद्रा/ रवि योग/ सर्वार्थ सिद्धि योग/ नारियली पूर्णिमा/ वरदल्क्षमी व्रत/ पूर्णिमा प्रारम्भ दोपहर 02.12/ झूलन यात्रा समाप्ति्/ हयग्रीव जयन्ती/ भारत छोड़ो आंदोलन दिवस, भारतीय बल्लेबाज सुधाकर राव जन्म दिवस, अंतरराष्ट्रीय बिल्ली दिवस, राष्ट्रीय व्हाटाबर्गर दिवस, राष्ट्रीय खुशी दिवस, राष्ट्रीय डॉलर दिवस, राष्ट्रीय पिकलबॉल दिवस, अंतर्राष्ट्रीय अनंत दिवस, हैप्पीनेस हैपन्स डे, शास्त्रीय संगीत गायिका सिद्धेश्वरी देवी जन्म दिवस, विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस, आध्यात्मिक गुरु नित्यानंद स्मृति दिवस, अंतर्राष्ट्रीय कैट डे (International Cat Day)
✍🏼 तिथि विशेष – चतुर्दशी तिथि को शहद त्याज्य होता है। चतुर्दशी तिथि को एक क्रूरा तिथि मानी जाती है। इतना ही नहीं चतुर्दशी तिथि को उग्रा तिथि भी माना जाता है। यह चतुर्दशी तिथि रिक्ता नाम से विख्यात मानी जाती है। यह चतुर्दशी तिथि शुक्ल पक्ष में शुभ और कृष्ण पक्ष में अशुभ फलदायिनी मानी जाती है। इस चतुर्दशी तिथि के देवता भगवान शिवजी हैं।।
🏘️ Vastu tips 🏚️
पारिजात का पेड़ कब लगाना चाहिए-पारिजात का पेड़ आप किसी भी शुक्रवार या फिर सोमवार को लगा सकते हैं। ये दोनों ही देवी पक्ष का दिन है जिसमें देवियों की पूजा होती है। वैसे, शुक्रवार की शाम को पारिजात का पेड़ लगाना सबसे सही समय और शुभ माना जाता है। ऐसा इसलिए कि ये लक्ष्मी की दिन और समय होता है।
इस दिशा में लगाएं पारिजात का पेड़- पारिजात का पेड़ उत्तर की दिशा में लगाना सबसे शुभ माना जाता है। ये शांति और समृद्धि की दिशा मानी जाती है। इस दिशा में इस पेड़ को ऐसे रखें कि सूरज की रोशनी सुबह उठते ही इस पर पड़े यानी कि उत्तर-पश्चिम की दिशा।
पारिजात का पेड़ लगाने के फायद पारिजात का पेड़ लगाने के फायदे कई हैं। ये जहां समृद्धि की दिशा है वहीं, ये घर के नेगेटिव एनर्जी को कम करने में भी मददगार है। इसके अलावा ये घर के लोगों को मानसिक शांति देते हैं और एक हेल्दी व लंबी उम्र देते हैं। साथ ही इस पेड़ को लगाने से घर में कई प्रकार के वास्तु दोष नहीं होते। आप इसे अपने घर के आगे लगा सकते हैं, अपने मंदिर के पास रख सकते हैं और साथ ही इसे छत पर भी रह सकते हैं।
♻️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
🛌 अब उपाय सुनो — नींद नहीं, गहरी नींद चाहिए तो ये करो:
✅ 1. त्रिफला चूर्ण रात को सोने से पहले: पाचन ठीक करता है, नींद गहरी लाता है।
✅ 2. ब्राह्मी और शंखपुष्पी का सेवन (दूध के साथ): दिमाग शांत करता है, जिससे नींद की क्वालिटी बढ़ती है।
✅ 3. तेल मालिश और नस्य (नाक में 2 बूंद घी): आयुर्वेद में “अभ्यंग” और “नस्य” को निद्रा का सबसे बड़ा सहायक बताया गया है।
✅ 4. डिजिटल डिटॉक्स – सोने से 1 घंटा पहले स्क्रीन बंद: दिमाग को शांत करो, तभी नींद आएगी।
✅ 5. रात को हल्का खाना – दलिया, मूंग की खिचड़ी, सूप: पेट हल्का रहेगा तो नींद गहरी आएगी।
🔔 छोटा अलर्ट: अगर नींद की दिक्कत महीनों से है, तो ब्लड टेस्ट ज़रूर कराएं — थायरॉइड, आयरन, बी12 और लिवर की जांच जरूरी है।
🥝 आरोग्य संजीवनी 🍓
🌿 4. सफेद मुसली (सत्व मुसली)
कैसा असर देता है:
सफेद मुसली शरीर को अंदर से पोषण देकर मांसपेशियों और नसों में ताकत भरती है। इसे लेने के कुछ ही समय बाद शरीर में हल्की गर्माहट और ऊर्जा महसूस होती है। लंबे समय तक इस्तेमाल से थकान पूरी तरह खत्म हो जाती है।
किसके लिए बेस्ट:
कमजोरी, थकान, और वजन कम वाले लोग
शारीरिक संबंध में कमजोरी
लंबे समय से बीमार रहे मरीज
कैसे लें:
1–2 ग्राम गुनगुने दूध में शहद डालकर
सुबह नाश्ते से पहले या रात को सोने से पहले
असली पहचान:
पाउडर सफेद से हल्का पीला
स्वाद हल्का मीठा
गीला होने पर हल्की चिपचिपाहट
🌷 गुरु भक्ति योग
🌹
क्या आप जानते हैं कि नागपंचमी के दिन लोग पका कटहल कहाँ व क्यों खाते हैं? कलियुग का ब्राहमण
ब्राह्मणों ने प्रचारित किया था कि: देवता मंत्रो के अधीन होते हैँ और मंत्र ब्राह्मणों के अधीन हैँ। अगर यह सत्य है तो ब्राह्मणो का क़त्ल तुर्कों ने जब भी किया तो उन्होंने अपने अधीन मंत्रो से, मंत्र अधीन देवताओं को अपनी रक्षार्थ क्यों नहीं बुलाया?
महाभारत के रचना कार नें ये क्यों लिखा 5 पांडव में से सिर्फ यूधिष्टर कुते के साथ स्वर्ग गये, जब कोई किसी कों कुत्ता कहता है तों वो उसे स्वर्ग पाहुचा देता होगा?
किसी को कुत्ता बोलने से वो आपको स्वर्ग पहुँचा देगा इस बात में क्या तुक है? क्या लॉजिक है? अगर किसी को kutta उसके गलत व्यावहार के लिए बोला गया जैसे कुछ कुत्ते काट लेते है या आपके स्कूटर, बाइक पे एक स्पॉट बना लिया है और सू सू कर जाता है, या झुंड बना के लोगों को काटने वाले कुत्ते भी होते है रोज, तो इस से उसका अवगुण की तुलना मे इंसान को बोला गया की तुमारी हरकत कुत्ते जैसे बिना दिमाग की है।
जो महाभारत की कथा है उसमे कुत्ते के गुण जैसे वफादारी, स्वामी भक्ति के लिए है, क्योंकि वो भोले होते है और रोज एक रोटी खिलाने मात्र से किसी संकट मे अपने स्वामी के लिए लड़ जाएंगे, मतलब मर तक जाएंगे।
महाभारत कथाः राजा जनमेजय ने क्यों लिया नाग यज्ञ का फैसला, कैसे हुआ सर्पों का जन्म?
महाभारत की कथा कौरव और पांडवों के बीच हुए भीषण युद्ध के लिए पहचानी जाती है, लेकिन असल में यह कथा सिर्फ 18 दिन तक चले युद्ध का व्याख्यान नहीं है. न ही इस कथा को महज परिवार के बीच पड़ी फूट और उससे उपजी त्रासदी के तौर पर देखना चाहिए. यह कथा असल में बताती है कि मानव का असली धर्म क्या है? साथ ही यह भी बताती है कि ब्रह्मा की बनाई गई यह मनुष्य नाम की रचना अच्छाई और बुराई में किस हद तक और कहां तक जा सकती है?
यही वजह है कि इस कथा कि शुरुआत अपने आखिरी बिंदु से होती है और फिर यह उल्टे क्रम में होते हुए अपने उच्च स्तर पर पहुंचती है. नैमिषारण्य में यज्ञ-तपस्या के लिए जुटे ऋषियों का हुजूम इसका पहला बिंदु हैं, जो उग्रश्रवा ऋषि से महाभारत की कथा सुनाने के लिए कहते हैं. उग्रश्रवा ऋषि उन्हें वह कथा सुनाते हैं जैसी ऋषि वैशंपायन ने राजा जनमेजय को सुनाई थी. इसलिए ऋषि वैशंपायन इसके दूसरे बिंदु और जनमेजय तीसरे. ऋषि वैशंपायन ने राजन को वह कथा वैसी ही सुनाई जैसी महर्षि वेदव्यास ने उसकी रचना की थी और श्रीगणेश ने उसे लिखकर तैयार किया था. आज संसार में महाभारत के जितने भी ग्रंथ मौजूद हैं वह ऋषि उग्रश्रवा की मुख से निकली उसी कथा का रूपांतरण हैं, जो ऋषि वैशंपायन राजा जनमेजय को उनका शोक दूर करने के लिए सुना रहे थे.
एक बार की बात है. नैमिषारण्य में ऋषियों से घिरे उग्रश्रवा जी से सभी ने पूछा- हे सौति कुलभूषण उग्रश्रवा. आपने हमें राजा जनमेजय की कथा सुनाई और आचार्य आरुणि धौम्य के महान गुरुभक्तों के बारे में भी बताया. इस दौरान आपने कहा था कि जनमेजय जब तक्षशिला पर विजय पाकर लौटे तब उन्हें अपने पिता राजा परीक्षिक की मृत्यु के बारे में पता चला. इसके बाद जनमेजय ने क्या किया? इसकी कथा हमें सुनाइए.
ऋषियों के इस प्रश्न पर उग्रश्रवा जी ने कहा- मैं अब वही सारी कथा आप सबको सुनाने जा रहा हूं. आपने जिन गुरुभक्त आरुणि और उपमन्यु की कथा सुनीं, उन्हीं दोनों के गुरु धौम्यऋषि का एक तीसरा शिष्य भी था, जिसका नाम था वेद. वेद भी अपने दो गुरुभाइयों की ही तरह गुरुभक्त था. फिर जब वेद ऋषि आचार्य बने तब उनका एक शिष्य हुआ उत्तंक. उत्तंक भी गुरुसेवा को ईश्वर की पूजा समझते थे और गुरु आज्ञा को वेद वाक्य. एक बार ऋषि वेद, किसी राजा के लिए यज्ञ कराने गए तो आश्रम की सारी जिम्मेदारी उत्तंक को ही दे गई. उत्तंक ने ये जिम्मेदारी ठीक तरह से निभाई.
फिर जब ऋषि वेद लौटे तो वह उत्तंक पर प्रसन्न हुए और उससे कहा, तुम्हारी दीक्षा पूरी हुई, तुमने मनोयोग से मेरी सेवा की, इसलिए तुम्हें सारा ज्ञान मिले और हर मनोकामना पूर्ण हो. अब तुम जाओ. उत्तंक ने ऋषि को प्रणाम करके कहा, मेरी दीक्षा आपके आशीष से पूरी हुई है, इसलिए आप कहिए कि मैं आपको गुरु दक्षिणा में क्या भेंट करूं? ऋषि वेद ने पहले तो मना किया, लेकिन जब उत्तंक ने बहुत कहा तो उन्होंने कहा- ठीक है, तुम गुरुमाता से पूछ ले.
उत्तंक ने गुरुमाता से यही प्रश्न किया. तब ऋषि वेद की पत्नी उत्तंक की गुरुमाता ने उससे अपनी इच्छा बताई. उन्होंने कहा तुम राजा पौष्य के महल जाओ और वहां उनकी रानी से स्वर्ण कुंडल मांग लाओ. मैंने एक व्रत लिया है और उसके पूर्ण होने पर मैं वह कुंडल पहनकर ब्राह्मणों को भोजन कराऊंगी. तुम्हारा कल्याण होगा
अब जब उत्तंक राजा पौष्य के महल की ओर चला तब उसने कई बार ऐसा अहसास किया कि कोई उसके पीछे है. कभी तो लगता कि कोई विशालकाय पुरुष चला आ रहा है. कभी कोई बैल पर चढ़कर दौड़ता नजर आता. कभी सिर्फ परछाई दिखती लेकिन कोई नहीं होता. खैर, इन सभी बाधाओं को पार कर उत्तंक राजा पौष्य के महल पहुंचा. वहां राजा को अपने आने की वजह बताकर उनसे अनुमति लेकर रानी से मिलने पहुंचा. रानी ने पहले उत्तंक को आचमन करा कर पवित्र कराया और फिर दिव्य कुंडल उन्हें दे दिया. उन्होंने चलते-चलते उत्तंक को सावधान किया कि तुम्हें बहुत ध्यान से इन्हें ले जाने की जरूरत है, क्योंकि नागराज तक्षक इन्हें चुराना चाहता है. वह ऐसी कोशिश कई बार कर चुका है. उत्तंक को मार्ग में मिली अपनी बाधाओं का ध्यान आ गया. खैर, वह रानी को आश्वासन देकर उनसे कुंडल लेकर गुरुमाता के पास चला.
अब रास्ते में वह जब कुछ आगे बढ़ा तो एक परछायी फिर उसका पीछा करने लगी. लेकिन उत्तंक बिना डरे आगे बढ़ता रहा. इस तरह चलते-चलते जब मार्ग में वह पानी पीने के लिए थोड़ा रुका तो उसी समय मौका देखकर नागराज तक्षक वह कुंडल लेकर भाग गया. तब उत्तंक ने इंद्र से प्रार्थना की और उनके वज्र की सहायता से नागलोक तक तक्षक के पास पहुंच गया. ऐसे में तक्षक ने भयभीत होकर रानी के कुंडल उत्तंक को दे दिए. खैर, किसी तरह वह ठीक समय पर गुरुमाता के पास पहुंचा, जरा भी देर होती तो शुभ मुहूर्त निकल जाता. उत्तंक ने वह कुंडल गुरुमाता को देकर उनसे आशीर्वाद लिया और फिर गुरु की आज्ञा से हस्तिनापुर आ गया.
उत्तंक नागराज तक्षक पर क्रोधित था और उससे बदला लेना चाहता था. इसलिए वह गुस्से में भरा हुआ हस्तिनापुर पहुंचा. वहां जनमेजय तक्षशिला विजय के बाद लौटे ही थे और उन्हें अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला. ठीक इसी समय उत्तंक भी वहां पहुंच गया और उसने ही कहा कि, हे पुण्यात्मा जनमेजय.
दुष्ट नागराज तक्षक ने ही आपके पिता को डंसा है. इस दुष्ट आत्मा ने मेरा भी खूब काम बिगाड़ा है. इसलिए आप इसे दंडित कीजिए.
इस तक्षक ने एक तो आपके पिता को डंसा और दूसरा इसने गलत काम यह किया कि जो ऋषि काश्यप आपके पिता की रक्षा के लिए आ रहे थे, उन्हें वापस लौटा दिया. इससे आपके पिता की मृत्यु हो ही गई. उन्हें बचाया भी नहीं जा सका. अब आप सर्प सत्र यज्ञ कीजिए और उस अग्नि में नागों को ही हवि बनाकर प्रचंड अग्नि में उनकी आहुति दे दीजिए. आप सर्प यज्ञ करेंगे तो मेरा भी आपका भी बदला पूरा हो गया और मुझे भी प्रसन्नता होगी. राजा जनमेजय अपने पिता की असमय मृत्यु से तो शोक में थे ही, उत्तंक के कहने पर और क्रोधित भी हो गए.
यह कथा सुनाकर ऋषि उग्रश्रवा ने अन्य ऋषियों को संबोधित करते हुए कहा- जैसा कि आप सबने प्रश्न किया था कि पिता की मृत्यु से शोक में डूबे जनमेजय ने क्या किया, तो इस प्रश्न का यही उत्तर है कि जनमेजय में सर्प सत्र यज्ञ यानि नागयज्ञ का आयोजन किया. उसने धरती के सभी नागों को नष्ट करने की प्रतिज्ञा कर डाली थी
जनमेजय के सर्पसत्र यज्ञ की बात सुनकर ऋषियों के बीच से महर्षि शौनक जी बोल पड़े, बेटे उग्रश्रवा! तुमने अपनी कथा में उत्तंक मुनि के क्रोध और जनमेजय के शोक का क्या कारण था यह बताया, लेकिन अब यह भी बताओ कि संसार में इन सर्पों का जन्म कैसे हुआ और इनके इस तरह यज्ञ में भस्म हो जाने की क्या वजह थी? फिर यदि सारे सर्प भस्म हो गए तो आज जो सर्प दिखाई देते हैं, उनकी रक्षा कैसे हुई? ये सभी रहस्य भी बताओ
महर्षि शौनक यह प्रश्न सुनकर ऋषि उग्रश्रवा ने उन्हें प्रणाम किया और बहुत विनीत स्वर में बोले- हे महामुनि आपकी आज्ञा से मैं पुराणों में वर्णित उस कथा को सुनाता हूं, उसे सुनिए. यह सही है कि जनमेजय के सर्प यज्ञ में सांपों की आहुति दी गई, लेकिन इस भयानक सर्पयज्ञ को रोकने वाले एक महान ऋषि हैं आस्तीक. उन्होंने सर्प और नागों के प्राण बचाए, इसलिए नाग उनका बहुत सम्मान करते हैं. बल्कि आस्तीक ऋषि का नाम सुनकर ही वह सर्प दूसरे रास्ते चले जाते हैं और सर्प दंश का भय नहीं रह जाता है. मैं यह सारे रहस्य बताता हूं
यह कथा सतयुग की है. दक्ष प्रजापति की कई कन्याएं थीं. उनमें से दो कन्याएं जिनका नाम कद्रू और विनता था, उनका भी विवाह ऋषि कश्यप से हुआ था. ऋषि कश्यप से कद्रू ने 1000 नाग पुत्रों को पाने का वर मांगा. वहीं विनता ने श्रेष्ठ, शक्तिशाली और मर्यादा की रक्षा करने वाले सिर्फ दो पुत्रों का ही वर मांगा. समय आने पर दोनों ही स्त्रियों ने गर्भ धारण किया, लेकिन उनके गर्भ सामान्य नहीं थे. वह अंडों के रूप में बाहर निकल आए. कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने सिर्फ दो. ऋषि की आज्ञा से इन अंडों को गर्म बरतनों में रखकर ढक दिया गया
समय आने पर कद्रू के 1000 अंडे धीरे-धीरे फूटे तो उनमें से बलशाली नागों का जन्म हुआ. यह देख विनता सोचने लगी कि मेरे अंडों पता नहीं कुछ है भी नहीं. उसने उत्सुक होकर एक अंडा फोड़ दिया. इस अंडे से एक शिशु निकला जो धीरे-धीरे बड़ा होता गया, लेकिन विनता ने देखा कि शिशु का ऊपरी धड़ तो ठीक है, लेकिन नीचे पैरों के अंग ठीक से नहीं बन पाए थे. बाहर निकलते ही वह शिशु आकाश में उठने लगा और क्रोध में आकर विनता को श्राप दिया कि, तूने सौतिया डाह में आकर और लोभ के कारण असमय ही मेरा अंडा तोड़ दिया, इससे मेरा जन्म विकृत अंगों के साथ हुआ है. मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तू अपनी उसी सौत की दासी बन जाएगी.
लेकिन मैं तुम्हें यह भी चेतावनी देता हूं कि दूसरे अंडे को न फोड़ना, उसे समय पर फूटने देना. उससे निकला तेरा पुत्र ही तुम्हें श्राप से मुक्त कराएगा. इस तरह वह शिशु आकाश में उड़ गया और तपस्या कर सूर्य देव का सारथि बन गया. वह अरुण कहलाया और सूर्य देव उनके ही खींचे जा रहे रथ पर विराजमान हैं. विनता ने दूसरे अंडे के धैर्य से फूटने की प्रतीक्षा की. उससे सुंदर मजबूत पंखों वाले गरुण का जन्म हुआ. यह गरुण आगे चलकर भगवान विष्णु के वाहन बने. इस तरह ऋषि कश्यप की पत्नी कद्रू से नागों का जन्म हुआ. यह नाग बड़े ताकतवर थे. इनमें से कुछ नागों के तो हृदय में भक्ति थी, इसलिए वह देवताओं के कार्य में सहयोगी बने लेकिन कई नाग सिर्फ अनिष्ट का ही कारण बने थे. उग्रश्रवा जी ने कहा, असल में जनमेजय के सर्प यज्ञ में नागों के भस्म होने की वजह उनको मिला एक श्राप था.
यह कथा सुनकर ऋषि बहुत आश्चर्य में पड़ गए. उन्होंने कहा- हमने यह तो समझ लिया कि नागों का जन्म किस तरह से हुआ और जनमेजय को भी सर्प यज्ञ क्यों करना पड़ा, लेकिन आपने इस कथा में नागों को भी मिले श्राप का जिक्र किया है. नागों को यह श्राप किस तरह मिला? इस पर उग्रश्रवा जी ने कहा- नागों को यह श्राप उच्चैश्रवा नाम के एक दिव्य घोड़े के कारण मिला था. यह घोड़ा बहुत बलशाली है और धरती से लेकर आकाश मार्ग तक उड़ने में सक्षम है. धरती पर इसके समान दूसरा कोई घोड़ा नहीं है. यह घोड़ा देवताओं को सागर मंथन से मिला था. वही सागर मंथन जिसमें से अमृत प्राप्त हुआ था.
शौनक ऋषि ने कहा- बेटे उग्रश्रवा, तुम बहुत सुंदर कथा कहते हो. हालांकि हम सभी सागर मंथन की कथा जानते हैं, फिर भी तुमसे यह कथा सुनकर आनंद आएगा. कहो बेटे, सागर मंथन की दिव्य कथा भी कहो.
उग्रश्रवा ऋषि ने महर्षि शौनक से प्रशंसा सुनकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें सागर मंथन की कथा सुनाई. एक बार देवताओं ऋषि दुर्वासा ने अभिमानी देवताओं को लक्ष्मीहीन हो जाने का श्राप दे दिया था. इस श्राप के कारण देवता बलहीन और ऐश्वर्य हीन हो गए. उधर असुर गुरु शुक्राचार्य ने शिवजी से मृत्युंजय मंत्र सीख लिया था. जब असुरों को देवताओं के शक्तिहीन होने का पता चला तब उन्होंने असुर राज बलि के नेतृत्व में तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया.
अब देवता असुरों पर विजय का उपाय पूछने विष्णु जी की शरण में गए. भगवान विष्णु ने उन्हें सागर मंथन की सलाह दी और कहा कि इससे जो अमृत प्राप्त होगा, उसे पीकर देवता अमर हो जाएंगे, लेकिन सागर को मथना न तो अकेले देवताओं के वश के बात थी और न ही असुरों के. तब विष्णु जी के समझाने पर देवराज इंद्र राजा बलि से मिले और उन्हें सागर मंथन के लिए मना लिया.
सागर में मथानी के लिए मंद्राचल पर्वत का शिखर काटकर लाया गया और नागराज वासुकी को रस्सी की तरह पर्वत के चारों ओर लपेट दिया गया. जब मंद्राचल पर्वत समुद्र में स्थिर नहीं हो पा रहा था, तब भगवान विष्णु कूर्म (कछुए) के रूप में आए और उन्होंने अपनी पीठ पर मंद्राचल को धारण कर उस स्थिर किया. इस तरह समुद्र मंथन प्रारंभ हुआ. सबसे पहले इस मंथन से विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण किया. इसके बाद कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, चंद्रमा, देवी लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, सुरा, रंभा अप्सरा और उच्चैश्रवा घोड़ा निकले. इसी समुद्र मंथन से आखिरी में अमृत प्राप्त हुआ.
जब इस अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ तब भगवान विष्णु मोहिनी बनकर आए और उन्होंने चतुराई से देवताओं को अमृत पिला दिया, लेकिन यह चतुराई बलि के सेनापति स्वरभानु के समझ में आ गई. वह देवताओं जैसा वेश बनाकर चंद्रमा और सूर्य के ठीक आगे जाकर खड़ा हो गया. मोहिनी बने भगवान विष्णु ने उसे भी अमृत पीने को दे दिया, लेकिन इसी समय सूर्य और चंद्रमा यह कौन है, यह कौन है कहकर शोर मचाने लगे. तब स्वरभानु असली रूप में आ गया
उसने जल्दी ही अमृत पीने की कोशिश की, लेकिन वह उसके गले तक ही पहुंच सका कि भगवान विष्णु ने सुदर्शन से उसका गला काट दिया. स्वरभानु अमृत पी लेने के कारण मरा नहीं, बल्कि दो भागों में होकर जीवित हो गया. उसका सिर राहु कहलाया और तन धड़ बन गया. उसने सूर्य और चंद्रमा को चेतावनी दी कि मैं तुम दोनों को खा जाऊंगा. इस तरह राहु को ग्रह मंडल में स्थान मिला और वह सूर्य व चंद्रग्रहण का कारण बन गया।
सागर मंथन की यह कथा सुनाकर ऋषि उग्रश्रवा रुके फिर बोले- ऋषियों, आपने सुना का उच्चैश्रवा घोड़ा सागर मंथन से कैसे उत्पन्न हुआ था. आगे चलकर यही उच्चैश्रवा घोड़ा नागों के श्राप की वजह बना और उन्हें जनमेजय के सर्प यज्ञ में भस्म होना पड़ा था.।
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⚜️ चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव का ज्यादा-से-ज्यादा पूजन, अर्चन एवं अभिषेक करना करवाना चाहिये। सामर्थ्य हो तो विशेषकर कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को विद्वान् वैदिक ब्राह्मणों से विधिवत भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाना चाहिये। आज चतुर्दशी तिथि में भगवान् शिव का रुद्राभिषेक यदि शहद से किया करवाया जाय तो इससे मारकेश कि दशा भी शुभ फलदायिनी बन जाती है। जातक के जीवन कि सभी बाधायें निवृत्त हो जाती है और जीवन में सभी सुखों कि प्राप्ति सजह ही हो जाती है।

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