हाथ ठेले से तख्त-ओ-ताज को चुनौती…

हरीश मिश्र, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
मुझे याद है, ये अस्सी-नब्बे के दशक की बात है…
तब रायसेन छोटा शहर था, लेकिन चुनावी राजनीति में गजब की गर्मी हुआ करती थी। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, राम मंदिर आंदोलन उफान पर था और सांची विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का चुनाव प्रचार कांग्रेस की अपेक्षा खासा आक्रामक हुआ करता था।
चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा साधन था- हाथ ठेला।
ठेले पर लाउडस्पीकर का बड़ा-सा चोंगा रखा जाता। कार्यकर्ता उसे लेकर गली-मोहल्लों में निकल पड़ते। वक्ता ठेले पर खड़ा होकर नारा लगाता—
“तख्त बदल दो, ताज बदल दो…
बेईमानों का राज बदल दो…”
फिर आवाज गूंजती—
“बारी-बारी सबकी बारी,
अबकी बारी अटल बिहारी…”
लाउडस्पीकर पर रोटी कपड़ा और मकान का गीत बजता—
“बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई…”
बच्चों, युवाओं की टोली ठेले के पीछे चलती। घरों के दरवाजे खुलते और देखते ही देखते पूरा मोहल्ला चुनाव प्रचार का हिस्सा बन जाता। नारे लगाने वाले बच्चे, युवाओं के लिए किशन सेठ की दुकान का पोहा, जलेबी और कचौड़ी, जैसे चुनावी इनाम का काम करते थे।
तब न सोशल मीडिया था, न व्हाट्सऐप और न डिजिटल चुनाव प्रबंधन। साधन कम थे, लेकिन लोगों से सीधा संवाद था।
आज एक संदेश कुछ सेकंड में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है। तब एक ठेला पूरी गली पार करने में वक्त लेता था। मगर उस धीमे सफर में नेता, कार्यकर्ता और मतदाता आमने-सामने होते थे।
आज चुनाव हाईटेक हैं, प्रचार तेज है, लेकिन उस हाथ ठेले की राजनीति में जो अपनापन था, वह स्मृति में अब भी जीवित है।
वक्त बदल गया…
चुनाव बदल गए…
प्रचार बदल गया…
लेकिन कुछ यादें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं—और गहरी होती जाती हैं।



