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देवउठनी एकादशी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा


Astologar Gopi Ram : आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
⚜▬▬ஜ✵❀ श्री हरि: ❀✵ஜ▬▬⚜
🔮 देवउठनी एकादशी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा
🔘 HIGHLIGHTS
▪️ कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है।
▪️ देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागते हैं श्रीहरि।
▪️ 12 नवंबर को मनाई जाएगी देवउठनी एकादशी।
▪️ शुभ कार्यों के लिए एक अबूज मुहूर्त है यह तिथि।
▪️ एकादशी तिथि 11 नवंबर को शाम 06:46 बजे शुरू।
देवउठनी एकादशी को हरि प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा से जागते हैं। आचार्य श्री गोपी राम के अनुसार, देवउठनी एकादशी दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनायी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। आचार्य श्री गोपी राम कहते हैं कि पुराणों के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं, जिसे चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि के दौरान विवाह और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ काम पुन: शुरू हो जाते हैं। इसका अर्थ है जागृत करने वाली एकादशी। इसलिए इस दिन को विवाह और अन्य मांगलिक कामों के आरंभ का प्रतीक माना गया है।
🛌🏻 इस विधि से जगाएं देव
देवउठनी एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाएं। इसके बाद पूजा स्थल की अच्छे से साफ-सफाई करें। अब घर के आंगन में भगवान विष्णु के पद चिह्न बनाए और उन्हें ढक दें। इसके बाद एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पूजा में प्रभु श्रीहरि को गन्ना, सिंघारा और फल आदि अर्पित करें, साथ ही उन्हें जनेऊ व नए वस्त्र चढ़ाएं।
रात्रि के समय में पूजा स्थल पर मां लक्ष्मी सहित देवी-देवताओं के निमित्त 11 दीपक जलाएं और वंदना करें। अब सहपरिवार भगवान विष्णु और उनके पद चिह्नों की पूजा-अर्चना करें। देवों को जगाने के लिए घंटी और शंख ध्वनि का इस्तेमाल करें और जयकार लगाएं। अंत में देवउठनी एकादशी व्रत की कथा सुनें।
⚛️ देवउठनी एकादशी शुभ मुहूर्त
कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 11 नवंबर को शाम 06 बजकर 46 मिनट पर प्रारंभ हो रही है। वहीं इसका समापन 12 नवंबर को दोपहर 04 बजकर 04 मिनट पर होगा। ऐसे में देवउठनी एकादशी व्रत मंगलवार, 12 नवंबर को किया जाएगा। इस दिन पारण का समय कुछ इस प्रकार रहेगा
💦 *पारण (व्रत खोलने) का समय – 13 नवंबर सुबह 06 ☄️ *देउ उठनी एकादशी पर 6 शुभ योग*
साल 2024 की देव उठनी एकादशी बेहद खास है। इस साल 6 शुभ योग बन रहे हैं। इन शुभ योग में काम शुरू करने से सफलता मिलती है। इन कामों में कोई बाधा नहीं आती है। आइये जानते हैं प्रबोधिनी एकादशी पर कौन-कौन से शुभ योग बन रहे हैं।
☀️ सर्वार्थ सिद्धि योगः यह योग देव उठनी एकादशी (12 नवंबर) की सुबह 7 बजकर 52 बजे से लेकर अगले दिन 5 बजकर 40 बजे तक रहेगा।
💮 रवि योगः रवि योग सुबह के 6 बजकर 40 मिनट से लेकर अगले दिन की सुबह के 7 बजकर 52 मिनट तक रहेगा।
☸️ हर्षण योगः हर्षण योग एकादशी के दिन शाम के 7 बजकर 10 मिनट तक रहेगा।
🔯 शुभः पूरे दिन
💧 अमृत योगः इस योग में यात्रा आदि शुभ कार्य श्रेष्ठ माने जाते हैं। प्रबोधिनी एकादशी (देव उठनी एकादशी) पर अमृत योग 13 नवंबर को सुबह 05:40 बजे तक है।
🌟 सिद्धि योगः इस योग में आप कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने के बारे में विचार कर रहे हैं तो आपको उसमें सफलता मिलती है। यह योग देव उठनी एकादशी पर 13 नवंबर की सुबह 5.40 बजे तक है।
💁🏻 देवउठनी एकादशी पूजा विधि
👉🏼 देवउठनी एकादशी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान ध्यान करें और भगवान विष्णु के व्रत का संकल्प लें.
👉🏼 मंदिर की साफ-सफाई करें और भगवान विष्णु, धन की देवी माता लक्ष्मी का स्मरण करें.
👉🏼 भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं, हल्दी या गोपी चंदन का तिलक लगाएं.
👉🏼 भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला, मिठाई, फल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएं.
👉🏼 भगवान विष्णु के ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय या कोई अन्य मंत्र जपें, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और आरती गाएं.
👉🏼 इसके बाद दिनभर व्रत रहें, किसी गरीब या ब्राह्मण को भोज कराएं, दक्षिणा दें.
👉🏼 रात में भगवान का भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें.
👉🏼 सुबह पूजा पाठ के बाद पारण समय में व्रत तोड़ें.
🤷🏻 देव उठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के विशेष मंत्र
वन्दे विष्णुं भव भय हरं सर्वलोकैक नाथम्
ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्
ॐ नमोः नारायणाय_

मंगलम् भगवान विष्णुः मंगलम् गरुणध्वजः मंगलम् पुण्डरीकाक्षः मंगलाय तनो हरिः
📖 देवउठनी एकादशी कथा
धर्म ग्रंथों में दी गई कथा के अनुसार एक राज्य में एकादशी के दिन प्रजा से लेकर पशु तक कोई भी अन्न नहीं ग्रहण करता था. एक दिन भगवान विष्णु ने राजा की परीक्षा लेने की सोची और सुंदरी भेष बनाकर सड़क किनारे बैठ गए. राजा की भेंट जब सुंदरी से हुई तो उन्होंने उसके यहां बैठने का कारण पूछा. स्त्री ने बताया कि वह बेसहारा है. राजा उसके रूप पर मोहित हो गए और बोले कि तुम रानी बनकर मेरे साथ महल चलो.
सुंदर स्त्री के राजा के सामने शर्त रखी कि ये प्रस्ताव तभी स्वीकार करेगी जब उसे पूरे राज्य का अधिकार दिया जाएगा और वह जो बनाए राजा को खाना होगा. राजा ने शर्त मान ली. अगले दिन एकादशी पर सुंदरी ने बाजारों में बाकी दिनों की तरह अन्न बेचने का आदेश दिया. मांसाहार बनाकर राजा को खाने पर मजबूर करने लगी. राजा ने कहा कि आज एकादशी के व्रत में तो मैं सिर्फ फलाहार ग्रहण करता हूं. रानी ने शर्त याद दिलाते हुए राजा को कहा कि अगर यह तामसिक भोजन नहीं खाया तो मैं बड़े राजकुमार का सिर धड़ से अलग कर दूंगी.
राजा ने अपनी स्थिति बड़ी रानी को बताई. बड़ी महारानी ने राजा से धर्म का पालन करने की बात कही और अपने बेटे का सिर काट देने को मंजूर हो गई. राजा हताश थे और सुंदरी की बात न मानने पर राजकुमार का सिर देने को तैयार हो गए. सुंदरी के रूप में श्रीहरि राजा के धर्म के प्रति समर्पण को देखर अति प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने असली रूप में आकर राजा को दर्शन दिए।
विष्णु जी ने राजा को बताया कि तुम मेरी परीक्षा में सफल हुए, कहो क्या वरदान चाहिए. राजा ने इस जीवन के लिए प्रभु का धन्यवाद किया कहा कि अब मेरा उद्धार कीजिए. राजा की प्रार्थना श्रीहरि ने स्वीकार की और वह मृत्यु के बाद बैंकुठ लोक को चला गया।

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