शराब में खुलकर लूट, सब्ज़ी में मोलभाव: 75 का क्वाटर 100 रुपए और 190 की वीयर 260

शहर में ठेकेदारों की मनमानी पर चुप क्यों सिस्टम?”
रिपोर्टर : विनोद साहू
बाड़ी । बाड़ी शहर का अजीब विरोधाभास अब खुलकर सामने आ रहा है—जहां आम आदमी सब्ज़ी के दो रुपये बचाने के लिए लंबी बहस करता है, वहीं शराब के ठेकों पर बिना सवाल जेब ढीली कर देता है। लेकिन अब मामला सिर्फ आदत का नहीं, बल्कि खुली लूट का बन चुका है।
शहर में संचालित दो शराब दुकानें—जिन्हें स्थानीय लोग “नंबर एक” और “नंबर दो” के नाम से जानते हैं—और शहर से करीब आठ किलोमीटर दूर अमरावद बस स्टैंड स्थित ठेका, इन दिनों मनमानी वसूली का अड्डा बन गए हैं। आरोप है कि तय कीमत से ज्यादा पैसे खुलेआम वसूले जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि अगर कोई ग्राहक हिम्मत करके पूछ ले—“भाई, इतना ज्यादा क्यों?”—तो उसे साफ शब्दों में जवाब मिलता है, “यहीं रेट है, लेना है तो लो, नहीं तो निकलो…”
नियम कागज़ों में, जमीनी हकीकत शून्य
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने अगस्त 2021 में आबकारी नीति में संशोधन करते हुए साफ निर्देश दिए थे कि हर शराब दुकान पर पक्का बिल देना अनिवार्य होगा, रेट लिस्ट चस्पा रहेगी और क्षेत्रीय आबकारी अधिकारी का मोबाइल नंबर भी सार्वजनिक रहेगा, ताकि कोई भी गड़बड़ी तुरंत शिकायत में आ सके।
लेकिन बाड़ी में ये नियम अब सिर्फ फाइलों में कैद नजर आ रहे हैं। न कहीं रेट लिस्ट दिखती है, न किसी अधिकारी का नंबर। “पक्का बिल” तो जैसे कहानी बन चुका है।
गांव-गांव दौड़ती शराब की गाड़ियां!
मामला यहीं खत्म नहीं होता। सूत्र बताते हैं कि ठेकेदार अब जीपों में भर-भरकर शराब गांव-गांव सप्लाई कर रहे हैं—जहां असली-नकली का फर्क करना मुश्किल है। सवाल उठता है कि यह सब बिना विभागीय नजरों के कैसे संभव है? या फिर… क्या यह सब मूक सहमति से हो रहा है?
जिम्मेदार कौन?
जब शहर के बीचों-बीच नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हों, तो ग्रामीण इलाकों का हाल समझना मुश्किल नहीं। आबकारी विभाग की चुप्पी अब कई सवाल खड़े कर रही है—
क्या विभाग को इस लूट की खबर नहीं?
या फिर सब कुछ “सेटिंग” के तहत चल रहा है?
शराब के शौकीन लोकलज्जा के भय से चुप क्यों, जबकि सभी जानते हैं कि यह ठेके से आ रहा हैं ।
सबसे बड़ा सवाल जनता से भी है—जो शराब के नाम पर लूट सह रही है, लेकिन आवाज उठाने से बच रही है।
अगर यही हाल रहा, तो “रेट” ठेकेदार तय करेंगे और “नियम” सिर्फ किताबों में रह जाएंगे।
यह मामला अब जांच और सख्त कार्रवाई की मांग करता है—वरना बाड़ी में शराब नहीं, सिस्टम बिकता नजर आएगा।



