जगन्नाथ का भात जगत पसारे हाथ, धूमधाम से मनाई गई माँ कर्मा जयंती

रिपोर्टर : विनोद साहू
बाड़ी । प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी तैलिक समाज की आराध्य देवी कृष्ण भक्त माँ कर्मा जी की मनमोहक मूर्ति जो भगवान कृष्ण जी को खिचड़ी खिलाते हुए की पुराने बाजार में पूजा अर्चना कर जुलूस के रुप में मुख्य मार्गो से निकलते हुए नया बस स्टैंड के पास माँ कर्मादेवी के मंदिर पर पहुंचा, इस बार माँ कर्मादेवी जी आरती की बोली लगाई गई। जिसमें उच्यतम बोली ग्यारह हजार ग्यारह रुपये में देवेन्द्र साहू अमरावद वालों को माँ कर्मादेवी की आरती का सौभाग्य मिला । आरती पश्चात सभी सामाजिक बंधुओं ने माँ की प्रसादी ग्रहण ।
समाज पर संकट के समय भगवान श्रीकृष्ण ने की सहायता।
वैसे तो माँ कर्मादेवी की कई कथाएं प्रचलित हैं जिसमें एक कथा में नरवर गढ़ झांसी जिला जहां पर मां कर्मा देवी के माता-पिता गांव है, उस नरवर गढ़ के राजा के हाथी को कोई रोग हो गया जिसका उपचार न होने पर राजा के मंत्रियों ने राजा के कान भरे और राजा से कहा कि महाराज अगर हाथी को तेल के कुंड में नहलाया जाए तो हाथी ठीक हो जायेगा उस समय तेली समाज कोल्हू चलाकर तेल का व्यापार करती थी तो राजा ने मुनादी करा दी आज से सभी तेली तेल निकालकर तालाब में डाले जिससे हाथी का ईलाज हो सके आठ दस दिन में ही तेली बंधुओं को तेल डालते हुए हो गये लेकिन तालाब में तेल का असर न होते देख सभी को भूखे मरने की नौबत आ गई। तब श्रीकृष्ण की उपासक माँ कर्मा जी ने भगवान से प्रार्थना करते हुए इस संकट से बचाने की प्रार्थना करते हुए निराहार ब्रत का प्रण किया। तब भगवान श्री कृष्ण ने माँ को सपने में दर्शन दिए और कहा कि कल सुबह एक लोटे में तेल लेकर जाना और उसे तालाब में खाली कर देना । माँ कर्मादेवी सुबह तेल लेकर तालाब पर पहुंची और तेल छोड़ने लगी लोटे से तेल की धार रुकी नहीं और तालाब भरता गया माँ तो कृष्ण भक्ति में लीन उन्हें पता ही नहीं चला कि तालाब कब का भरा चुका और तालाब लबालब होने के साथ ही गाँब में बहने लगा तब राजा अपनी रानी सहित तालाब पर पहुँचकर माँ कर्मादेवी से क्षमायाचना कर तेल रोकने की प्रार्थना की ।
जगन्नाथ का भात जगत पसारे हाथ।
माँ कर्मादेवी बुढापे के समय जगन्नाथ पुरी मंदिर के दर्शन करने पहुंची तो मंदिर के पुजारियों ने उन्हें मंदिर से भगा दिया और दर्शन नहीं करने दिए जिससे व्यथित होकर माँ कर्मादेवी ने बही एक झोपड़ी बनाकर भगवान की भक्ति करने लगी एक रोज भगवान श्रीकृष्ण बालक के रुप में अलसुबह माँ कर्मादेवी की झोपड़ी में पहुँचे और कहने लगे माँ बहुत भूख लगी हैं खाने को दो तब माँ ने कहा कि बेटा रुक अभी बनाती हूँ माँ कर्मा जी जल्दी में खिचड़ी बना दी और भगवान खाकर चले गए, यह सिलसिला रोज का हो गया, एक दिन माँ कर्मादेवी को खिचड़ी बनाने में देर हो गई और भगवान खिचड़ी खाकर बगैर मुँह धुले ही चले गए माँ चिल्लाती रही बेटा मुँह धो ले लेकिन मंदिर के पट खुलने का समय हो चुका और भगवान दौड़कर मंदिर में चले माँ कर्मादेवी बही बैठकर पट खुलने का इंतज़ार करती रही जब पुजारियों ने माँ कर्मादेवी को बैठी देखा तो भगाने गले तब माँ ने कहा कि गोपाल बगैर मुँह धुले ही आ गया उसके मुँह पर खिचड़ी लगी हैं मुझे मुँह धोना हैं। पुजारियों ने माँ को पागल समझा डाँट दिया लेकिन जब पट खोले तो भगवान के मुँह पर खिचड़ी लगी देखकर हतप्रद हो गये और माँ को ढूडने लगे लेकिन माँ नहीं मिली। तभी से पुरी के भगवान जगन्नाथ स्वामी के मंदिर में खिचड़ी का महा प्रसाद का भोग लगता हैं । जबकि ग्यारस के दिन चावल खाना बर्जित होता हैं लेकिन भगवान के प्रसाद की खिचड़ी में कोई दोष नहीं होता।

