मध्य प्रदेश

सत्र शुरू हुए बीते 7 महीने, पर स्कूलों को नहीं मिला फूटी कौड़ी का बजट

कागजी पेचों में उलझी प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा

रिपोर्टर : शिवकुमार साहू
सिलवानी । मध्यप्रदेश के शासकीय प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में शैक्षणिक सत्र 2026-27 का आधा समय बीत चुका है। अप्रैल माह से नया सत्र शुरू होने के बाद से नवंबर आ चुका है, लेकिन प्रदेश के हजारों स्कूलों को अब तक आकस्मिक खर्चों के लिए स्कूल ग्रांट (रखरखाव व संचालन बजट) की राशि जारी नहीं की गई है। बजट के अभाव में स्कूल प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया है, जबकि दूसरी ओर विभागीय दबाव के कारण शिक्षक मोबाइल स्क्रीन पर ऑनलाइन काम में ही अपना दिन बिताने को मजबूर हैं।
जेब से खर्च कर रहे शिक्षक: शौचालय सफाई से लेकर राष्ट्रीय त्योहारों तक का बोझ
शिक्षकों और प्रधानपाठकों का कहना है कि शासन की ओर से बजट की एक भी किश्त जारी नहीं हुई है, लेकिन धरातल पर कार्यक्रमों की लंबी सूची थमा दी गई है। अप्रैल से लेकर अब तक विद्यालयों में:

  • वृक्षारोपण अभियान
  • शौचालय की नियमित सफाई व स्वच्छता
  • राष्ट्रीय त्योहार (15 अगस्त)
  • विभिन्न महापुरुषों की जयंतियां एवं विभागीय पखवाड़े
    इन सभी आयोजनों को अनिवार्य रूप से मनाने के सख्त निर्देश जारी किए गए। बजट न होने के कारण इन कार्यक्रमों का पूरा वित्तीय बोझ शिक्षकों को अपनी जेब से या उधार लेकर उठाना पड़ रहा है। स्कूलों में स्वच्छता और बुनियादी व्यवस्थाएं बनाए रखना भी अब शिक्षकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
    पढ़ाई छोड़, ऐप्स और पोर्टल्स की ‘डेटा एंट्री’ में उलझे गुरुजी
    एक तरफ जहां बुनियादी सुविधाओं के लिए बजट का टोटा है, वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों पर ऑनलाइन कामकाज का मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। शिक्षक संगठनों का दावा है कि शिक्षक अपना अमूल्य समय बच्चों को पढ़ाने के बजाय एम-शिक्षा मित्र, दीक्षा, यू-डाइस प्लस (UDISE+) जैसे अनगिनत ऐप्स और पोर्टल्स पर ऑनलाइन जानकारी फीड करने में लगा रहे हैं। उपस्थिति से लेकर मिड-डे मील और छात्रवृत्ति तक का रीयल-टाइम डेटा अपलोड करने के फेर में शिक्षण कार्य पूरी तरह हाशिए पर आ गया है। ग्रामीण अंचलों में खराब नेटवर्क की वजह से शिक्षकों का आधा दिन सिर्फ सर्वर डाउन होने की समस्या से जूझने में ही निकल जाता है।
    शिक्षा बजट बढ़ा, पर धरातल पर सुविधाएं गायब
    आंकड़ों के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा स्कूल शिक्षा का बजट तो लगातार बढ़ाया जा रहा है, लेकिन धरातल पर यह पैसा स्कूलों तक समय पर क्यों नहीं पहुंच रहा, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। गणवेश (यूनिफॉर्म) की राशि का डीबीटी (DBT) भुगतान भी लेटलतीफी का शिकार है, जिससे पालक और शिक्षक दोनों परेशान हैं। शिक्षक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि ऑनलाइन कामों के नाम पर हो रही कागजी खानापूर्ति को कम किया जाए और सत्र शुरू होते ही तत्काल आकस्मिक निधि (बजट) जारी की जाए, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो और स्कूलों का सुचारू संचालन किया जा सके।

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