हमें माफ नहीं करेगी ये बेगमनदी ! नगर में बदहाली का शिकार हुई बेगम नदी, पूरे नगर की गंदगी झेल रही
वर्षों से जिला और स्थानीय प्रशासन बना रहे संवारने के प्लाॅन, कागजों के बाहर नहीं निकल पाए
हर दिन बदहाल होती जा रही बेगम नदी, दुर्दशा ऐसी की पूरे नगर की गंदगी झेलने का साहस वही दिखा रही
सिलवानी। घर से निकलने वाला मल, मूत्र, गंदगी, कूड़ा, करकट और ऐसी तमाम सामग्री जो हम घर में नहीं रखना चाहते, वह नगर की जीवनदायनी कही जाने वाली बेगमनदी झेल रही है। न सिर्फ झेल रही है, बल्कि सह भी रही है, हमारी ज्यादतियां, हमारी मनमानी और लापरवाहियां। अगर यह दौर सतयुग जैसा होता तो निश्चित ही ये नदी सिलवानी को कभी माफ नहीं करती। यहां का जिम्मा ओढ़ने वाले जिम्मेदार इसे देखकर इस तरह से अनजान है जैसे कि उनका इससे कोई लेना-देना ही नहीं है। इतना ही जिम्मेदार वे आम नागरिक भी है जो इसे दूषित करने में लगे हैं। साथ ही उन जिम्मेदारों को लेकर खामोश है जिनके कारणन सिर्फ नदी बेहाल हुई, बल्कि जनता की तकलीफें भी बढ़ी है, लेकिन खुद की आवाज उठाकर आगे नहीं आने वाले ऐसे लोग कुछ भी कहने, बोलने और करने को तैयार नहीं है। नतीजा यह रहा कि अब हर तरह से सिलवानी में व्यवस्थाएं बिगड़ रही है।
किसी दौर में तैरते थे लोग, घाटों पर होती थी पूजा
बेगमनदी को लेकर नगर के वरिष्ठजन बताते हैं कि किसी दौर में इसी नदी में लोग तैरते थे, नहाते थे और भरपूर साफ-सुथरा पानी यहां भरा रहता था। साथ ही बुजुर्ग बताते हैं कि इस नदी के राम मंदिर के पास वाले घाट, टेकरी मंदिर के घाट सहित अन्य घाटों पर पूजा होती थी, गणेश विसर्जन, दुर्गा विसर्जन सहित अन्य धार्मिक कार्य होते थे, लेकिन अब हालात यह है कि इन घाटों पर बैठ पाना भी मुश्किल है। श्राद्ध, तर्पण सहित अन्य महापर्वों पर टैंकरों का सहारा लिया जाता है।
एक नदी को नहीं संभाल पाया प्रशासन
स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ ही प्रशासन के लिए भी यह शर्म की बात है। एक मात्र नदी को संवार पाना प्रशासनिक जिम्मेदारों के लिए चुनौती बना हुआ है। बीते हर साल जैसे-जैसे अधिकारी बदलते रहे, नदी की मरम्मत, संरक्षण के लिए प्लान बने, योजनाएं बनीं लेकिन वे एसी के कमरों से बाहर नहीं निकल पाईं।
मजबूत इच्छाशक्ति के अभाव में काम नहीं हो पा रहे हैं। जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और दृढ़ संकल्पी अधिकारी यदि सोच ले तो निश्चित ही नदी की दशा बदली जा सकती है।
मुकेश साहू, युवा, सिलवानी।




