ग्राम पंचायत पौनियाँ में नाला सौंदर्यीकरण घोटाला, विकास के नाम पर खुली लूट, जिम्मेदार मौन

रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान | भारत में ग्राम पंचायतें ग्रामीण विकास की रीढ़ मानी जाती हैं, पर जब यही पंचायतें भ्रष्टाचार की अंधेरी गलियों में भटकने लगती हैं, तो विकास की बजाय विनाश की तस्वीर उभरती है । ऐसा ही एक ज्वलंत उदाहरण है ग्राम पंचायत पौनियाँ, जहाँ नाला सौंदर्यीकरण के नाम पर खुली लूट चल रही है । जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं, शिकायतों के बाद भी जांच नहीं हो रही, और पंचायत का नाम विकास की बजाय भ्रष्टाचार की दलदल में फंसा हुआ है ।
*नाला सौंदर्यीकरण, कागजों में जिम्मेदार मौन*
ग्राम पंचायत पौनियाँ में नाला सौंदर्यीकरण की कई योजनाओं को स्वीकृत किया गया था । इन योजनाओं का उद्देश्य था बरसात में जलभराव की समस्या को समाप्त करना, गंदगी और मच्छरजनित बीमारियों से ग्रामीणों को राहत देना, और पंचायत की सुंदरता बढ़ाना । लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल विपरीत है । नालों की खुदाई अधूरी पड़ी है, सीमेंट और रेत की गुणवत्ता घटिया स्तर की है, नालों के किनारे लगाए जाने वाले सुरक्षा दीवारों का निर्माण सिर्फ कागजों में हुआ है। ग्रामवासियों का कहना है कि जब वे मौके पर जाकर निरीक्षण करते हैं, तो उन्हें सिर्फ खोदे हुए गड्ढे, उखड़ी हुई मिट्टी, और बिल जमा करने की होड़ दिखाई देती है।
*सरकारी धन का बेहिसाब दुरुपयोग*
नाला सौंदर्यीकरण के नाम पर जो धन पंचायत को आवंटित हुआ, इसमें से एक बड़ी राशि पहले ही आहरित की जा चुकी है। लेकिन जब स्थानीय संवाददाता सतीश चौरसिया ने मौके पर निरीक्षण किया तो पाया कि मौके पर कोई भी कार्य संतोषजनक रूप से पूर्ण नहीं मिला, टेंडर प्रक्रिया में अपारदर्शिता, एक ही ठेकेदार को बार-बार काम देना। मजदूरों के नाम पर भुगतान, जो असल में काम पर आए ही नहीं। निर्माण सामग्री की फर्जी बिलिंग, सीमेंट, रेत, और गिट्टी की कीमतें बाजार से तीन गुना।भुगतान में जल्दीबाज़ी, कार्य पूर्ण होने से पहले ही बिलों का भुगतान।
*उपयंत्री की भूमिका संदिग्ध भ्रष्टाचार की जड़ में तकनीकी विभाग*
ग्राम पंचायत पौनियाँ में तैनात उपयंत्री की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे अधिक संदिग्ध मानी जा रही है। जानकारों के अनुसार, उपयंत्री ने न तो स्थल निरीक्षण किया, न ही कार्य की गुणवत्ता जांची, लेकिन फिर भी मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कर दी गई।बिना स्थल निरीक्षण के कार्य स्वीकृति। घटिया निर्माण कार्य को पास करना। ठेकेदारों से सांठगांठ कर कमीशन लेना। फर्जी निर्माण को वैध बताना। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उपयंत्री हर योजना में कमीशन पहले ही तय कर लेते हैं।



