
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
मंगलवार 25 नवम्बर 2025
25 नवम्बर 2025 दिन मंगलवार को मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष कि पंचमी तिथि है। आज भगवान श्री राम और माता सीता का मंगल परिणय अर्थात विवाहोत्सव का दिन है। आज मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को ही श्रीराम सीता का विवाह हुआ था। आज दूसरी नागपंचमी है। अर्थात आज की पंचमी को भी देश के कई जगहों पर नाग देवता की पूजा करके नाग पंचमी मनाया जाता है। आज सिक्खों के धर्मगुरु तेग बहादुर जी का शहीद दिवस है। आज जैन लोगों का णमोकार 35 व्रत और 12 उपवास है। आप सभी सनातनियों को “भगवान श्री राम और माता सीता के मंगल परिणय अर्थात विवाहोत्सव” की हार्दिक शुभकामनायें।।
हनुमान जी का मंत्र : हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ।
🌌 दिन (वार) – मंगलवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से उम्र कम होती है। अत: इस दिन बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए ।
मंगलवार को हनुमान जी की पूजा और व्रत करने से हनुमान जी प्रसन्न होते है। मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा एवं सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए।_
*मंगलवार को यथासंभव मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करके उन्हें लाल गुलाब, इत्र अर्पित करके बूंदी / लाल पेड़े या गुड़ चने का प्रशाद चढ़ाएं । हनुमान जी की पूजा से भूत-प्रेत, नज़र की बाधा से बचाव होता है, शत्रु परास्त होते है। 🔮 *शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल* 🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
👸🏻 शिवराज शक 352_
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
🌧️ ऋतु – सौर हेमंत ऋतु
⛈️ मास – मार्गशीर्ष मास
🌒 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📆 तिथि – मंगलवार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि 10:57 PM तक उपरांत षष्ठी
📝 तिथी स्वामी – पंचमी के देवता हैं नागराज। इस तिथि में नागदेवता की पूजा करने से विष का भय नहीं रहता, स्त्री और पुत्र प्राप्ति होती है। यह लक्ष्मीप्रदा तिथि हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र उत्तराषाढ़ा 11:57 PM तक उपरांत श्रवण
🪐 नक्षत्र स्वामी – उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। तथा राशि स्वामी गुरु है तो इस नक्षत्र का अधिष्ठाता देवता विश्वेदेव हैं।
⚜️ योग – गण्ड योग 12:49 PM तक, उसके बाद वृद्धि योग
⚡ प्रथम करण : बव – 10:12 ए एम तक
✨ द्वितीय करण : बालव – 10:56 पी एम तक कौलव
🔥 गुलिक काल : मंगलवार का गुलिक दोपहर 12:06 से 01:26 बजे तक।
🤖 राहुकाल (अशुभ) – दोपहर 15:19 बजे से 16:41 बजे तक। राहु काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
⚜️ दिशाशूल – मंगलवार को उत्तर दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो कोई गुड़ खाकर यात्रा कर सकते है।
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 06:07:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 05:08:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:04 ए एम से 05:58 ए एम
🌆 प्रातः सन्ध्या : 05:31 ए एम से 06:52 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : 11:47 ए एम से 12:29 पी एम
✡️ विजय मुहूर्त : 01:53 पी एम से 02:36 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 05:22 पी एम से 05:49 पी एम
🌌 सायाह्न सन्ध्या : 05:24 पी एम से 06:45 पी एम
💧 अमृत काल : 05:00 पी एम से 06:45 पी एम
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:42 पी एम से 12:35 ए एम, नवम्बर 26
❄️ रवि योग : 11:57 पी एम से 06:53 ए एम, नवम्बर 26
🚓 यात्रा शकुन-दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ अं अंगारकाय नम:।
💁🏻♀️ आज का उपाय-देवी मन्दिर में सवाकिलो अनार चढ़ाएं।
🌴 वनस्पति तंत्र उपाय- खैर के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – रवि योग/ विवाह पंचमी/ नागपूजा/ राष्ट्रीय पार्फ़ेट दिवस, प्रसिद्ध भाषाविद, साहित्यकार सुनीति कुमार चटर्जी जन्म दिवस, बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दीप नारायण सिंह जन्म दिवस, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सितारा देवी स्मृति दिवस, भारत में राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) की स्थापना दिवस, भाषाविद सुनीति कुमार चटर्जी जयन्ती, क्रिकेटर झूलन गोस्वामी जन्म दिवस, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन अंतर्राष्ट्रीय दिवस, “नो नॉन-वेज डे”, साधु टी. एल. वासवानी जयन्ती, राष्ट्रीय एकता दिवस, विश्व मांसाहार रहित दिवस (सप्ताह)
✍🏼 तिथि विशेष – पञ्चमी तिथि को बिल्वफल त्याज्य बताया गया है। पञ्चमी तिथि को खट्टी वस्तुओं का दान और भक्षण दोनों ही त्याज्य है। पञ्चमी तिथि धनप्रद अर्थात धन देनेवाली तिथि मानी जाती है। यह पञ्चमी तिथि अत्यंत शुभ तिथि भी मानी जाती है। इस पञ्चमी तिथि के स्वामी नागराज वासुकी हैं। यह पञ्चमी तिथि पूर्णा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह पञ्चमी तिथि शुक्ल पक्ष में अशुभ और कृष्ण पक्ष में शुभ फलदायीनी मानी जाती है।
🗺️ Vastu tips 🗽
फेंगशुई के अनुसार, कछुए को सही स्थान और सही प्रकार रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है। पौराणिक ग्रंथों और हिंदू धर्म में कछुए को सुख-समृद्धि देने वाला माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, विष्णुजी ने स्वयं कच्छप अवतार लिया था। साथ ही, कछुए को शांत जीव माना जाता है। ऐसे में आप इसकी फोटो अपने मंदिर में लगा सकते हैं। इसके अलावा, कछुए की छोटी प्रतिमा को पानी से भरे पीतल या अष्टधातु के पात्र में रखना चाहिए। इस प्रकार घर या अपने मंदिर में कछुआ रखने से बेहद शुभ फल की प्राप्ति होती है।
*अक्सर हम घर पर अपने अनुसार स्थान चुनकर कछुए को रख देते हैं। लेकिन फेंगशुई और वास्तु में इसे रखने की सही दिशा बताई गई है, जिसका ध्यान जरूर रखना चाहिए। मान्यता है कि उत्तर दिशा माता लक्ष्मी की होती है। ऐसे में कछुए को अपने घर में उत्तर दिशा में ही रखना चाहिए। ऐसा करने से धन की देवी माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और जातक का बैंक बैलेंस भी बढ़ सकता है। मान्यता है कि उत्तर दिशा में कछुआ रखने से शत्रुओं का भी नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। 🎯 *जीवनोपयोगी कुंजियां* ⚜️ *सौंठ के ज्यादातर गुण अदरक के समान ही होते है। इसका स्वाद तीखा और तासीर गर्म या उष्ण होता है। यह कफ और वात दोषों का शमन करती है और ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर पित्त को बढ़ाती है।
*यह भोजन में स्वाद को बढ़ाती है। भूख और पाचन में सुधार लाती है। *यह आम का पाचन करने में उपयुक्त होने के कारण आमवात में काफी लाभदायक है। सौंठ 1 चम्मच, 2 चम्मच शहद और 2 चम्मच एरंड तेल को मिलाकर सुबह खाली पेट लगातार कुछ दिनोंतक लेने से आमवात में जोड़ों के सूजन और दर्द से राहत मिलने में फायदा होता है।
*कफनाशक होने से खांसी, श्वास (दमा) जैसे श्वसन मार्ग के विकारों में फायदेमंद है। इस में शहद के साथ सेवन करना चाहिए। *अपने ग्राही गुण के कारण यह आंतों से अतिरिक्त पानी का शोषण करती है और दस्त, पेचिश में उपयुक्त है।
*यह मितली, उलटी, जोड़ों के दर्द, मासिक धर्म के समय होनेवाले दर्द और वजन कम करने में भी फायदेमंद है। 🫖 आरोग्य संजीवनी ☘️
औषधीय प्रयोग: आँखों के लिए-मत्स्याक्षी पत्र-स्वरस में दुग्ध मिलाकर नेत्रों को धोने से नेत्राभिष्यंद (आँख का आना), अंजनामिका तथा कृमिग्रन्थि में लाभ होता है।
*अतिसार-मत्स्याक्षी कल्क को दही के साथ मिलाकर खाने से अतिसार तथा संग्रहणी में लाभ होता है।
*शुक्रमेह-मत्स्याक्षी मूल स्वरस (10 मिली) में सप्तपर्ण काण्ड त्वक् को पीसकर, गाय के दूध के साथ सेवन करने से शुक्रमेह में लाभ होता है। *मत्स्याक्षी पत्र-स्वरस (5 मिली) को दूध के साथ सेवन करने से शुक्रमेह में लाभ होता है।
*त्वचा रोग में लाभदायक: दाद, खाज, खुजली और फोड़े-फुंसियों जैसे त्वचा संक्रमणों के इलाज के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों का रस या पेस्ट बनाकर प्रभावित जगह पर लगाया जाता है। *ज्वर और सूजन: यह ज्वररोधी और शोथरोधी गुणों के कारण ज्वर और सूजन में लाभकारी है।मूत्र संबंधी समस्याएँ: इसके पूरे पौधे का रस मूत्रवर्धक होता है और खुलकर पेशाब लाने में मदद करता है।
*सर्पदंश: सांप के काटने पर इसकी पत्तियों का पेस्ट बनाकर काटे हुए जगह पर लगाने से सर्पदंश का विष कम हो जाता हैं। 📚 गुरु भक्ति योग 🕯️
अगर कोई व्यक्ति मर जाता है तो उसके दांत क्यों नहीं जलते हैं? 🤔🤔
*दांत जबड़ा सब जल कर खाक हो जाते हैं। जो बचता है वह है हड्डियों के कुछ अंश। अगली सुबह लोग चिता की राख से बचे हुए अस्थियों के टुकड़े चुनते हैं जिन्हे जल में प्रवाहित किया जाता है। चिता की आग में इतनी गर्मी रहती है कि अगली सुबह जब अस्थियाँ चुनने जाते हैं तब तक चिता की राख गर्म ही रहती है। मैंने आज तक बिना जला दांत चिता की राख में नहीं देखा। बस कुछ हड्डी के टुकड़े बच जाते हैं।
*शरीर का करीब दो तिहाई हिस्सा पानी है। यह सब भाप बन कर हवा में गायब हो जाता है। 100 किलो के शरीर में जलने के लिए 30 किलो ही बचता है। चिता की आग में इतनी गर्मी होती है कि माँस, लिगामेंट, टेंडन आदि भी भाप बन कर गायब हो जाते हैं। शरीर के मिनरल जल कर गायब नहीं होते लेकिन सबूत भी नहीं बचते। यह टुकड़े में टूट चिता की राख मे मिल जाते हैं। ज्यादातर हिस्सा जल कर चुरे में बदल जाता है। टुकड़े कम बचते हैं। इसी कारण चिता की राख सिर्फ लकड़ी की राख की तरह महीन नहीं होती। यह खुरदरी होती है। *हड्डियां और दांत की बाहरी परत (एनामेल) मिनेरल्स से बनी होती है इस कारण जल कर ओर्गनिक हिस्से की तरह गायब नहीं होती। इसके हिस्से राख का अंश होते हैं। दांत जबड़े के सारे हिस्से जैसे पल्प आदि भाप बन उड़ जाते हैं। एनामेल चूर चूर हो जाता है और राख का अंश बन जाता है। हड्डियाँ खास कर बड़ी हड्डियों के टुकड़े पूरी तरह चूर नहीं हो पाते और इसके कुछ अंश टुकड़ों के रूप में बच जाते हैं। कुछ टुकड़े इतने बड़े बचते हैं कि कलश में समा नहीं पाते। कोई भी सबूत दांत चिता की राख में नहीं मिलेगा। यह अलग बात है कि अगर चिता ठीक से ना जल पाई हो। ऐसे में कुछ भी बचा रह सकता है।
समान्यतः चिता में सिर्फ अस्थियों के अंश मिलते हैं बिना जले दांत नहीं।
📖 *गुरु भक्ति योग* 🕯️
महाभारत युद्ध से पहले दुर्योधन ने कर दी एक बड़ी गलती, कौरव सेना पर भारी पड़ गए अकेले अर्जुन, भीष्म कर्ण हुए अचेत
*महाभारत युद्ध से पहले जब पांडव विराट राज्य में अज्ञातवास काट रहे थे तब कीचक के वध के बाद दुर्योधन ऐसी गलती कर बैठे की उनका सामना सीधा अर्जुन से हुआ। तब युद्ध के मैदान में कौरव सेना पर अर्जुन का 12 साल का क्रोध ज्वालामुखी बनकर फूटा। इसका परिणाम यह हुआ की दुर्योधन न तो पांडवों का अज्ञातवास भंग कर पाया और गोधन हरण करने में भी असफल रहा। अंत में कौरवों की सेना को वहां से अपमानित होकर वापस लौटना पड़ा। आइए विस्तार से जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से कि आखिर दुर्योधन ने महाभारत युद्ध से पहले ऐसी क्या गलती की और अकेले अर्जुन कौरव सेना पर कैसे भारी पड़ गए। भीम ने कीचक किया का वध पांडव और द्रौपदी 12 साल के वनवास के बाद 1 वर्ष का अज्ञातवास अपना रूप बदलकर विराट राज्य में काट रहे थे। उस दौरान कीचक द्रौपदी के रूप पर मोहित हो गया और उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगा। जिससे भीम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कीचक का वध कर दिया। जब यह बात दुर्योधन को पता चला की कीचक का वध हो गया तब सभी चकित रह गए कि आखिर कीचक जैसे महारथी का वध कौन कर सकता है, वह तो अजय था। इस पर कर्ण ने कहा की कीचक का वध केवल भीष्म पितामह, स्वयं दुर्योधन, कर्ण और भीम कर सकते हैं। कौरवों ने तब अनुमान लगाया की कीचक का वध करने वाला भीम हो सकता है क्योंकि वह ही इस समय यहां नहीं है और उनके रहने का स्थान भी किसी को नहीं पता है। दुर्योधन ने विराट राज्य पर आक्रमण करने की बनाई योजना कौरवों द्वारा अनुमान लगाने के बाद कि पांडव विराट राज्य में छिपे हुए हैं, तब दुर्योधन ने पिता महाराज धृतराष्ट्र और भीष्म पितामह से कहा की कीचक का वध हो गया है और अब विराट राज्य को बचाने वाला कोई नहीं है। ऐसे में हमें उसे अब अपने संरक्षण में ले लेना चाहिए। इसके पश्चात कौरवों ने विराट राज्य पर आक्रमण करने और गोधन हरण करने का फैसला लिया। दुर्योधन का मानना था कि भीम ने ही कीचक का वध किया है। ऐसे में दुर्योधन ने पहले अपने मित्र सुशर्मा को विराट नगर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। सुशर्मा त्रिगत का राजा था और विराट राज्य उसका दुश्मन था। अर्जुन ने उत्तरा को दिया अपना असली परिचय *विराट नगर की सेना को कमजोर समझकर सुशर्मा और कौरव सेना ने विराट राज्य पर आक्रमण कर दिया। विराट और उनके पुत्र अपनी बची हुई सेना को लेकर युद्ध करने पहुंचे। लेकिन जब युवा राजकुमार उत्तरा ने कौरवों की सेना देखी तो वह घबरा गया और उसे समझ नहीं आया की वह इतनी बड़ी सेना और इतने महारथियों का सामना कैसे करेगा। तब अर्जुन ने विराट के पुत्र उत्तरा को रोका और उन्हें अपने साथ एक वन में ले गए। वहां पांडवों ने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र छुपाए हुए थे। जब अर्जुन सारे शस्त्र निकालने लगे तो उत्तरा चकित रह गए की जिन शस्त्रों को देखकर भी डर लगता हो वे आप पर कैसे मौजूद हैं। इस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन ने अपना असली परिचय दिया और अपने रूपों के बारे में भी बताया।
अकेले अर्जुन कौरवों की सेना पर पड़े भारी
*_उत्तरा सत्य जानने के पश्चात अर्जुन के साथ युद्ध भूमि पर पहुंचे। अर्जुन बृहन्नला का रूप धारण करके विराट उत्तरा का के सारथी बनकर युद्ध करने गए थे। तब पूरी कौरवों की सेना पर अकेले अर्जुन भारी पड़ गए। दुर्योधन को इस बात का जरा भी अनुमान नहीं था की उसका सामना अर्जुन के साथ होगा। उस समय अर्जुन का 12 वर्षों का क्रोध ज्वालामुखी बनकर युद्ध की भूमि पर फूटा। इस युद्ध में भीष्म और कर्ण अचेत हो गए। ऐसे में सारे महारथी मिलकर उनपर हमला करने लगे। तब अर्जुन ने दिव्यास्त्र चलाया और सम्मोहन अस्त्र का प्रयोग करके कौरवों की सेना पर विजय प्राप्त की। इसका परिणाम यह हुआ की दुर्योधन न ही विराट राज्य को जीत पाया और न ही गोधन हरण करने में विजयी हुआ। दुर्योधन पांडवों के अज्ञातवास को भंग करने की इच्छा से भी विराट राज्य में पहुंचा था। लेकिन चंद्रमास के अनुसार, पांडवों का अज्ञातवास समाप्त हो चुका था। ऐसे में दुर्योधन पांडवों का अज्ञातवास भी भंग नहीं कर सका।
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⚜️ पञ्चमी तिथि में शिव जी का पूजन सभी कामनाओं की पूर्ति करता है। आज पञ्चमी तिथि में नाग देवता का पूजन करके उन्हें बहती नदी में प्रवाहित करने से भय और कष्ट आदि की सहज ही निवृत्ति हो जाती है। ऐसा करने से यहाँ तक की कालसर्प दोष तक की शान्ति हो जाती है। अगर भूतकाल में किसी की मृत्यु सर्पदंश से हुई हो तो उसके नाम से सर्प पूजन से उसकी भी मुक्ति तक हो जाती है।



