धार्मिक

इस्लाम में औरतो का बड़ा मकाम है : आफताब आलम

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । इस्लामी कानून के मुताबिक किसी ख्वातीन का निकाह उसकी मर्जी के बिना या उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं किया जा सकता। पैगंबरे इस्लाम ने कहा, बेवा औरत का निकाह तब तक ना किया जाए जब तक उस से इजाजत न ले ली जाय, और एक कुंवारी की उसकी इजाजत के बिना शादी नहीं करना चाहिए। इस्लाम में ख्वातीन का बड़ा मकाम आया है कुरान पाक में भी आयत नाजिल हुई है।
उक्त बात स्टार ग्रुप द्वारा फिरदौस शादी हाल जामा मस्जिद में आयोजित महिलाओं के जलसे में लखनऊ से तशरीफ लाए मौलाना आफताब आलम ने कही। उन्होंने आगे कहा कि बीवी के रूप में भी इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई मर्द कितना अच्छा है, इसका मापदंड इस्लाम ने उसकी बीबी को बना दिया है। इस्लाम कहता है अच्छा इन्सान वहीं है जो अपनी बीवी के लिए अच्छा है। यानी इंसान के अच्छे होने का मापदंड उसकी हमसफर है।
मौलाना आफताब आलम ने कहा कि इस्लाम की ये खूबी हैं के इस्लाम मे इन्सान कि फितरत के सवब हर मसले का हल रखा और किसी मसले के हल के लिए बस इन्सान को खुदा और उसके रसूल के बताये एहकाम पर अमल करना हैं। बावजूद इसके लोग इस्लाम के बताए तरीको से फायदा नही उठाते और नुकसान मे रहते हैं। खुदा ने इन्सान की तख्लीक के लिये सिर्फ़ एक जोड़ा आदम अलै. और हव्वा अलै. को बनाया और इनसे तमाम नस्ल इन्सानी की तख्लीक की अगर अल्लाह ने ज़ात बिरादरी की बन्दिश को भी इन्सान के निकाह के शर्त के तौर पर लगाया होता तो आदम अलै. और हव्वा अलै. के बाद दुनिया मे कोई इन्सान नही होता या खुदा आदम अलै. और हव्वा अलै. की तरह कई और जोड़े पैदा कर दुनिया मे एक सिस्टम बना देता के हर इन्सान अपनी ही पुरखो की नस्ल मे निकाह करे।
बावजूद इसके इन्सान इन तमाम बातो पर गौर फ़िक्र किए बिना ही इस अहम सुन्नत को अदा करने मे ताखीर करता हैं। और बिरादरी के फेरे में पड़ कर बच्चियों की शादी में ताखीर करता है। आज जरूरत है कि वक्त पर ही हम अपनी बच्चियों की शादी करें उन्हें दीन की तालीम जरूर दिलाते हुए उन्हें दीन भी सिखाए यही अमल हम अपने बच्चों के साथ भी करें।
अपनी बच्चियों को स्कूल या मदरसा छोड़ने और लेने भी जाएं क्योंकि आज के दौर में भेड़िया नस्ल के लोगों की वहशी नजरे बहन बेटियों पर लगी रहती हैं हमें अपनी बच्चियों की हिफाजत खुद करना है। पुलिस हर जगह मौजूद नहीं रहती इसलिए पर्दे के एहतमाम के साथ हमारी मां बहने स्कूल मदरसा या बाजार में जाएं इसकी हमें फिक्र करना है। इस्लाम में बेटियों को बराबर का हक दिया गया है शादी करके ही बेफिक्र ना हो जाए बल्कि मां-बाप अपनी जायदात में जहां बेटे को हिस्सा देते हैं वहां बेटी को भी हिस्सा दें। उन्होंने मियां बीवी के हुकूक और अपनी औलाद की परवरिश के हुकुम के बारे में भी विस्तार से रोशनी डाली।
लखनऊ से बेगमगंज पहुंचने पर आफताब आलम का पुराना बस स्टैंड पर शहर के उलेमाओं और स्टार ग्रुप के नौजवानों ने फूल मालाओं से अभूतपूर्व स्वागत किया।

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