दो दिवसीय प्राकृतिक जैविक कृषि कार्यशाला में किसानों को मल्टी लेयर फार्मिंग की जानकारी दी

रिपोर्टर : मनीष यादव
पलेरा । राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक नाबार्ड द्वारा वित्त पोषित एवं भारतीय बहुउद्देशीय लोक शिक्षण संस्था द्वारा संचालित चरी निवावरी जल ग्रहण प्रबंधन परियोजना में चरी एवं निवावरी के किसानों को दो दिवसीय प्राकृतिक जैविक कृषि कार्यशाला का सागर स्थित आकाश चौरसिया जी के फार्म पर आयोजन किया गया। इस आयोजन में आकाश चौरसिया द्वारा किसानों को केंचुआ खाद बनाना, देसी बीज बनाना, कीट नियंत्रण बनाना, फसलों का प्रबंधन एवं सोलर विधि से प्रसंस्करण का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। उन्नत कृषि अभियान परिषद द्वारा किसानों को मल्टी लेयर तकनीक में उगाई जा रही विभिन्न फसलों का अवलोकन कराया गया मल्टी लेयर कृषि के साथ पानी बचाने की विधि, देसी बीज बनाने, संगीत थेरेपी, जैव विविधता एवं प्रसंस्करण में नवाचार के साथ किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। परियोजना प्रबंधक रामावतार पांडे द्वारा किसानों को नाबार्ड की सभी स्कीमों को विस्तार से बताया गया। और किसानों को कार्यशाला से मल्टी लेयर फार्मिंग की तकनीक सीकर अपने यहां करने के लिए कहा गया और इसमें परियोजना के माध्यम से भी किसानों को सहयोग दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रकृति से जुड़कर उत्पादन को जहर मुक्त करने की सलाह श्री पांडे जी ने किसानों को दी और इस तरह के आयोजन और कार्यशालाएं प्रशिक्षण भ्रमण करने से किसानों के मानसिक स्थिति को बदलने में सहयोगी होते हैं साथ ही किसान आत्मनिर्भर एवं स्वालंबी बनेंगे प्राकृतिक खेती से पर्यावरण का संरक्षण होता है दो दिवसीय कार्यशाला में आकाश चौरसिया ने बताया कि उनका लक्ष्य प्रत्येक थाली में रसायन मुक्त पोषण युक्त भोजन परोसकर सर्वोत्तम स्वास्थ्य निश्चित करना है वर्तमान संदर्भ में कृषि की परिभाषा को बदलना है भारत एक अग्रणी कृषि प्रधान देश है भारतीय कृषि की महिमा को वैश्विक स्तर पर बढ़ता है किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है गौ आधारित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना और भारतीय प्रजातियों का संरक्षण करना। रसायन आधारित कृषि भूमि को जैविक खेती में परिवर्तित करना और इसे गैर कृषि भूमि में परिवर्तन होने से बचाना। पारंपरिक भारतीय स्वदेशी बीजों के उपयोग के लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाना। युवाओं को कृषि के बारे में राष्ट्र की रीड के रूप में पहचान के लिए प्रेरित करना उन्हें अपनी जड़ों की ओर वापस जाने और खेती को एक पेशे के रूप में चुनने के लिए प्रेरित करना। अनुसंधान और अध्ययन उद्देश्यों के लिए प्राचीन पारंपरिक साहित्य उपलब्ध कराकर पारंपरिक भारतीय खेती की विरासत को समर्पित करना। मल्टी लेयर फार्मिंग एक ऐसी कृषि तकनीक है जो काम जगह में कम लागत में एक साथ चार और पांच परत तक की खेती की जा सकती है अपनी बहू परत कृषि तकनीक में वह पौधों की उचित वृद्धि के लिए एक सुरक्षात्मक और आरामदायक वातावरण के रूप में बांस और तार की जालीदार संरचनाओं का उपयोग करते हैं इस तकनीक को चार से पांच परतों में बांटा गया है। पहली परत में भूमिगत जड़ वाली फसल जैसे अदरक और हल्दी लगाई जाती है। दूसरी परत में मिट्टी की सतह पर पत्तेदार सब्जियां जैसे धनिया पालक को लगाया जाता है। तीसरी परत में जो जाली पर लता फसल उदाहरण के लिए करेला कुंदरु परवल आदि। चौथी परत जाली के ऊपर फलों की फसल उदाहरण पपीता या सहजन। पांचवी परत मिट्टी की तरह सात और जालीदार संरचना के बीच अतिरिक्त लता वाली सब्जियां उदाहरण लौकी गिलकी तुरई कद्दू आदि का लगाना होता है। इस तकनीक में 70 से 80% जल का संरक्षण होता है।खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण होता है । कीटों के हमले का खतरा कम हो जाता है। खाद की उपयोग में तीन गुना कमी आती है। नकारात्मक पर्यावरणीय परिवर्तनों से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित और कम करता है। भूमि के एक छोटे से टुकड़े पर भूमि उपयोग में तीन गुना कमी और उत्पादन में चार गुना वृद्धि हासिल की जाती हैं । इस प्रकार प्रशिक्षण में चरी निवावरी जलग्रहण समिति अध्यक्ष श्रीपदसिंह भदोरिया, मनीराम साहू कृषि विशेषज्ञ विवेक द्विवेदी इंजिनियर संदीप प्रजापति के साथ लगभग 20 किसानों ने प्रशिक्षण लिया। उन्होंने संकल्प लिया कि इस प्रशिक्षण के उपरांत हम अपने परिवार के लिए आधा एकड़ कृषि भूमि पर मल्टी लेयर फार्मिंग जैविक तकनीक से करेंगे।



