स्कूली बच्चों की जल परीक्षा, बीमारों की चारपाई यात्रा – विकास से कोसों दूर बड़ाखेत
सरकारें बदलीं चेहरे बदले दावे बदले नहीं बदली तो सिर्फ़ बड़ा खेत की बदहाली
21वीं सदी में रस्सियों के सहारे जिंदगी न सड़क न पुल न इलाज बड़ाखेत गांव के आदिवासी हर दिन मौत से जूझ रहे।
गर्भवती महिलाएं खाट पर उफनती नदी पार करती हैं मासूम बच्चे पिता के कंधों पर नदी पार करने को मजबूर
कलेक्टर से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक सबको सुनाया दर्द मिला सिर्फ़ आश्वासन राहत अब तक नहीं
ग्राम मझगवां के आदिवासी टोला बड़ा खेत से मृगांचल एक्सप्रेस की ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट
सिलवानी । जब देश चंद्रयान की सफलता और डिजिटल क्रांति पर गर्व कर रहा है तब उसी देश में एक गांव अब भी रस्सियों के सहारे उफनती नदी पार कर मौत से सामना कर रहा है। सिलवानी जनपद पंचायत के ग्राम पंचायत बटेर के अंतर्गत आने बाला टोला बड़ाखेत में न सड़क है न पुल और न ही इलाज की कोई सुविधा बरसात आते ही यह गांव टापू बन जाता है सिलवानी मुख्यालय से 15, किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में लगभग 450, लोगों की आबादी है। बरसात शुरू होते ही यह गांव पूरी तरह से बाकी दुनिया से कट जाता है। टोला बड़ा खेत से ग्राम खेरी तक का ढाई किलोमीटर का कच्चा रास्ता दलदल कीचड़ और उफनती नदी से होकर गुजरता है।यहां गर्भवती महिलाएं प्रसव पीड़ा में भी खाट पर लेटकर नदी पार करती हैं। मासूम बच्चे पिता के कंधों पर बैठकर स्कूल जाते हैं। इस टोले के 14 मिडिल और 4 हाईस्कूल के छात्र हर दिन जान जोखिम में डालकर ग्राम खेरी स्कूल पढ़ने जाते हैं। कुछ बच्चों ने उफनती नदी पार करने के डर से स्कूल जाना छोड़ दिया है। टोला बड़ा खेत में आदिवासियों के लिए उपचार की कोई व्यवस्था नहीं है
इन आदिवासीयों को सिर्फ़ कंधे और खाट का सहारा है
गांव में कोई इलाज नहीं कोई स्वास्थ्य केंद्र नहीं। बरसात में तो मोटरसाइकिल तक नहीं आ सकती। इस टोले के बासियों के लिए खाट ही स्ट्रेचर है कंधा ही एंबुलेंस। गांव में कोई स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। बरसात में एंबुलेंस तो छोड़िए बाइक भी इस टोले में नहीं पहुंच पाती। बीमारों को खाट पर बांधकर उफनती नदी पार कर ढाई किलोमीटर दूर खेरी गांव ले जाना पड़ता है ग्राम खेरी गाव से गर्भवती महिलाएं वाहन से सिलवानी सिविल अस्पताल पहुच पाती हैं इस बड़ा खेत टोले में 5 साल पहले इलाज के अभाव में दो महिलाओं की मौत भी हो चुकी है। इसके बावजूद भी प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के चलते टोला बड़ा खेत में ना सड़क बन पाई ना ही स्वास्थ्य की कोई सुविधा है और ना ही नदी पर पुल का निर्माण कराया गया जिसके कारण ग्रामीण काले पानी जैसी सजा भोग रहे हैं टोला बड़ा खेत में स्थित आंगनबाड़ी में 34 बच्चे दर्ज है इन बच्चों को आंगनबाड़ी तक पहुंचना भी चुनौती बना है
आंगनबाड़ी जाने के लिए छोटे छोटे बच्चों को कीचड़ और दलदल के बीच से गुजरना पड़ता है। कई बार बच्चे कीचड़ और फिसलन में गिरकर घायल हो जाते हैं। इसके बावजूद प्रशासन का ध्यान इस और नहीं गया। ग्रामीणों ने कई बार कलेक्टर से लेकर मंत्री तक को ज्ञापन सौंपे लेकिन हर बार सिर्फ़ आश्वासन ही मिला। आज भी ग्रामीणों को वही बदहाली और डर के साए में जीना पड़ रहा है। ग्रामीण कहते हैं कि यह तो काला पानी जैसी सजा भोग रहे है बड़ा खेत टोले में सड़क बिजली स्वास्थ्य जैसी कोई सुविधा नहीं है सुनीता ठाकुर गर्भवती महिला ने बताया कि खाट पर लेटकर नदी पार करने में मौत का डर लगता है कहीं रास्ते में बच्चा ना हो जाए।इसकी भी चिंता होती है मुन्नालाल कुशवाहा ने बताया कि 5 साल पूर्व टोला बड़ा खेत में इलाज के अभाव में 2 महिलाओं की मौत हो चुकी है इसके बावजूद भी प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से हमारा गांव वंचित है ग्राम में सड़क और नदी पर पुल बनवाने को लेकर हमारी अधिकारियों ने कोई सुनवाई नहीं की बड़ा खेत निवासी रजनी बाई बताया कि टोला बड़ा खेत से ग्राम खेरी तक का 3 किलोमीटर कच्ची सड़क का कच्चा रास्ता है घुटनें घुटने कीचड़ मे से दलदल पार करते हैं सांप बिच्छू जहरीले जीव जंतु कीचड़ भरे रास्ते में मिलते हैं हमेशा मौत का डर बना रहता है बच्चे रस्सियों पर लटक कर उफनती नदी पार कर स्कूल जाते हैं इसके बाद भी प्रशासन चुपचाप बैठा है।



