श्रीमद्भभागवत कथा में दूसरे दिन भरत चरित्र एवं धुव्र चरित्र का वर्णन
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान । उमारियापान के आजाद चौक पर केशव असाटी के निज निवास पर चल रही भागवत कथा के दूसरे दिन संत प्रवर महामण्डलेशर सिया बल्लभदास वेदांती महाराज अयोध्या धाम ने संगीतमय प्रवचन में कहा कि भ्रातत्व प्रेम किसी का है तो वह भरत जी। वर्तमान समय में भरत चरित्र की बहुत बड़ी प्राथमिकता है जिस स्वार्थ के कारण आज भाई भाई जहां दुश्मन जैसा व्यवहार करते हैं वही भरत चरित्र में त्याग संयम धैर्य और ईश्वर प्रेम भरत का दूसरा उदाहरण है भरत का विग्रह या स्वरूप श्री राम मूर्ति के समान है जिससे भाई के प्रति प्रेम की शिक्षा मिलती है इस समय मनुष्य में भाई वह ईश्वर के प्रति प्रेम नहीं है तो वह यह जीवन पशु समान होता है भरत और राम से भाई वह ईश्वर के प्रेम नहीं है सीख लेनी चाहिए रामायण में भरत जी की एक ऐसा पात्र है जिसमें स्वार्थ व परमार्थ दोनों को समान दर्जा दिया गया है इसलिए भरत जी का चरित्र अनुकरणीय भरत जी का एक एक प्रसंग धर्म सार है क्योंकि भरत का सिद्धांत लक्ष्य की प्राप्ति व राम जैसा भाई होना चाहिए।
धुव्र चरित्र का वर्णन
भक्त ध्रुव ने पिता व सौतेली मां के व्यवहार के बाद घर छोड़ दिया था और जंगल में तपस्या शुरू कर दी थी जंगल में उन्हें भगवान ने दर्शन दिए इसके बाद वह घर चले आए। उन्होंने बताया कि भक्त ध्रुव ने आठ वर्ष की उम्र में ही भगवान की प्राप्ति कर ली थी । इस दौरान कथा श्रोता केशव असाटी , लक्ष्मी असाटी, सुलोचना असाटी, सहित आलोक असाटी, संजय असाटी, हरिओम असाटी, श्रीओम असाटी, शरद असाटी, सुनील असाटी, पुलिकित असाटी, धर्मेन्द्र असाटी, दीपू असाटी, सहित आदि की उपस्थिति रही ।



