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व्यापारी बाहर से आकर 1 हजार रुपए प्रति बीघा खरीद रहे डंठल, भूसा बनाकर कर रहे परिवहन

पशु मालिकों के सामने मंडराएगा संकट, जरुरत पर महंगे दामों पर खरीदना बनती है मजबूरी
किसान तीसरी फसल लगाने के लिए या तो आग लगा देते हैं या फिर बैंच रहे

सिलवानी। इन दिनों पूरी तहसील में अवैध रुप से भूसा बनाने और उसे जिले से बाहर परिवहन करने का गौरखधंधा जोरों से शुरु हो चुका है। किसानों में जागरुकता की कमी का फायदा बाहर से आने वाले भूसा व्यापारी जमकर उठा रहे हैं। किसान भी परेशानी से बचने के लिए खेतों में फसल निकालने के बाद डंठल या तो भूसा व्यापारियों को बैच देते हैं या फिर नरवाई में आग लगा देते है। जिससे हर साल तहसील में भूसे का संकट तो मंडराता ही है साथ ही पशु पालकों को महंगे दामों पर भूसा खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। यही नहीं गोशाला में भी भूसे की कमी होने के कारण प्रबंधक पशुओं को जंगलों की ओर यथास्थिति में छोड़ देते हैं। उल्लेखनीय है गेहूं की फसल हार्वेस्टर से कटवाने के बाद किसान 500 से 1000 रुपए प्रति बीघा नरवाई भूसा बनाने वालों को बेच रहे हैं। इससे सीजन के दिनों में ही पशु पालकों को एक ट्रॉली भूसा 3 हजार से 3500 रुपए प्रति ट्रॉली की दर से खरीदना पड़ रहा है। इधर बाहर के व्यापारी खेतों में तैयार हो रहा भूसा सीधे खरीद कर बाहर भेज रहे हैं। कुछ स्टॉक कर रहे हैं। इससे कमी आने पर उसका भरपूर दाम वसूल सकें।
किसान खुद कर सकते हैं दोहरी कमाई
किसान यदि जागरुक होकर थोडी सी मेहनत कर ले तो डंठल से दोहरी कमाई कर सकते हैं। किसान या तो इन डंठलों से खाद बनाकर अगली फसल जैसे मूंग, सब्जी या अन्य फसलों का बेहतर उत्पादन कर सकते हैं। या फिर खुद ही भूसा बनाकर इसे बैच सकते हैं, जिससे जहां फसलों में डलने वाले खाद में होने वाले खर्च की बचत होगी तो वहीं भूसा बेंचकर स्वयं भी संपन्न बन सकते हैं। लेकिन मेहनत से बचने के लिए किसानों की अनदेखी का फायदा माफिया किस्म के व्यापारी जमकर उठा रहे हैं।
गांव-गांव भूसा खरीदने घूम रहे व्यापारी
भूसा खरीदने के लिए गांव-गांव व्यापारी घूम रहे हैं। हार्वेस्टिंग के बाद व्यापारी खुद किसानों के खेत की नरवाई का भूसा ठेका में निकलवा कर ले जा रहे हैं। इसके कारण भूसे का स्थानीय स्तर पर स्टॉक नहीं हो पा रहा। गांव के किसान अपने जानवरों के लिए तो भूसा का स्टॉक कर लेते हैं। शेष भूसा या नरवाई व्यापारियों को हवाले कर देते हैं। व्यापारी भी खेत मालिक को हर तरह का लालच देकर भूसा खरीदकर परिवहन कर ही लेता है।
शासन की नीति ऐसी कि मजूदरों की कार्यक्षमता हुई कमजोर
दरअसल पहले किसान मजदूरों से फसल कटवाते थे। एक मजदूर को दिन भर में 20 किलो अनाज मिल जाता था। मजदूर परिवार के लिए साल भर का स्टॉक कर लेते थे। लेकिन सरकार ने मजदूरों को एक रुपए किलो गेहूं चावल देना शुरू किया है। कई बार वह एक रूपए भी नहीं देते हैं ऐसे में उन्हें फ्री में राशन पानी मिल जाता है, जिससे उनकी काम करने की क्षमता पूरी तरह से कमजोर हो गई यही वजह है कि अब मजदूर धूप में कटाई करने जाते ही नहीं। कटाई से थ्रेसिंग के दौरान खासा भूसा मिल जाता था। लेकिन वर्तमान में हार्वेस्टिंग की कटाई से आधा भूसा ही मिल पाता है। उसे भी व्यापारी खरीद कर ले जाते हैं। इससे लगातार तहसील में भूसा की समस्या आने लगी है।

जिले से पशु चारा-भूसा का निर्यात प्रतिबंधित :

जिले में पशु चारा एवं भूसा की कमी की आशंका को दृष्टिगत रखते हुए पशुओं को पर्याप्त मात्रा में चारा-भूसा की आपूर्ति बनाए रखने हेतु जिला दण्डाधिकारी अरूण कुमार विश्वकर्मा के निर्देशानुसार अतिरिक्त जिला दण्डाधिकारी मनोज उपाध्याय द्वारा तत्काल प्रभाव से जिले से अन्य राज्यों में पशु चारे-भूसा का निर्यात प्रतिबंधित किया गया है। जारी आदेश के तहत पशु आहार में आने वाले सभी प्रकार के चारे, भूसा, घास, कड़वी ज्वार के डंठल, पैरा धान के डंठल आदि का जिले से अन्य राज्यों में निर्यात, उद्योगों एवं ईट के भट्टे में जलाने को मप्र चारा निर्यात नियंत्रण आदेश 2000 में निहित प्रावधानों के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए तत्काल प्रभाव से 30 जून 2026 तक प्रतिबंधित किया गया है। कोई भी कृषक, व्यापारी, निर्यातक व्यक्ति किसी भी प्रकार से प्रतिबंधित पशु चारा एवं भूसा का परिवहन किसी वाहन, नाव, मोटर, रेल या किसी भी यान द्वारा रायसेन से राज्य से बाहर प्राधिकृत अधिकारी की अनुज्ञा पत्र के निर्यात नहीं करेगा। इस संबंध में संबंधित एसडीएम को अनुज्ञा पत्र जारी करने के लिए प्राधिकृत किया गया है। यह आदेश तत्काल प्रभावशील होगा।
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इनका कहना है
स्पेशल दल का गठन बनाकर औचक निरीक्षण कराया जाएगा है। यदि ट्रक या ट्रैक्टर के माध्यम से किसी प्रकार की ट्रांसपोर्टिंग सड़क पर होती हुई पाई जाती है, तो संबंधित वाहन के विरुद्ध पुलिस के माध्यम से आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
हर्षल चौधरी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व सिलवानी

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